हज़रतगंज से घर तक: रिक्शे की सवारी में खुला दर्द, संघर्ष और सुकून का सफ़र
🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
रिक्शावाला

वो लखनऊ की एक सर्द रात थी । रात के क़रीब साढ़े दस बज रहे होंगे । वैसे तो हज़रतगंज की महफ़िल ही गुलज़ार होती है , दस बजे के बाद जब गाड़ियों का शोर थम सा जाता है । शाम में गंजीग ( हज़रतगंज में तफ़रीह को स्थानीय लोग गंजीग करना कहते हैं ) तो बाहरी मतलब लखनऊ शहर में घूमने आने वाले लोग करते हैं । लखनौए की गंजीग तो शाम गहराने के बाद शुरू होती है । पर उस दिन सर्दी कुछ ज़्यादा ही थी । शहरवासियों के लिए गलन वाली ठंडी का इस मौसम का पहला अहसास था । सड़कों पर आवाजाही नहीं के बराबर थी। कुछ इक्के दुक्के वाहन ही चलते हुए दिखाई दे रहे थे । खाने पीने की कुछ दुकानें खुली हुई ज़रूर थीं, पर वे भी अब हालात को देखते हुए बंद करने ही जा रहे थे । हाँ कुछ मेहनतकशों की मजबूरी थी ,जो सड़कों पर दिखाई दे रहे थे ।
अमित की दिल्ली से आने वाली फ्लाइट कोहरे की वजह से लेट हो गई थी । जिस फ्लाइट को शाम सात बजे तक लखनऊ पहुंचना था वो रात के नौ बजे पहुँची । अमित के कानवायर बेल्ट से सामान लेकर बाहर निकलते – निकलते साढ़े नौ बज चुके थे । बाहर टैक्सी वालों ने मानो आपदा में अवसर ढूँढ लिया था । अनाप शनाप पैसे माँग रहे थे । ओला उबर वाले भी कुछ देर रूककर राइड कैंसिल कर दे रहे थे । तंग आकर अमित ने वहाँ से मैट्रो पकड़ कर आना ही मुनासिब समझा । सोचा चलो हज़रतगंज तक मेट्रो से जाकर फिर कोई दूसरी सवारी ले लेंगे । और कोई विकल्प भी तो नहीं था ।
हज़रतगंज स्टेशन से बाहर निकल उसने देखा वहाँ कोई ओटो या टैक्सी खड़ी नहीं थी । हाँ एक दो रिक्शे वाले ज़रूर थे । उसने एक रिक्शे वाले को हाथ के इशारे से बुलाया।
हज़रतगंज मेट्रो स्टेशन से उसके घर की दूरी इतनी अधिक भी नहीं थी कि रिक्शे से ना जाया जा सके । खैर ! रिक्शे वाला जाने को तैयार हो गया । इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में कभी कभार रिक्शे की सवारी आपको आपके फ़्लैशबैक में लिए जाती है । आप उन्हीं पुराने यादों में खो से जाते हैं । अपने आप को आप उसी दौर में ले जाते हैं । अमित एक पचास पार का व्यक्ति जिसने बदलते हुए दौर को काफ़ी क़रीब से देखा है और महसूस किया है उन बदलावों को । घर तक का सफ़र कोई बीस से पच्चीस मिनट का था । सड़क सुनसान थी, ट्रेफ़िक नहीं के बराबर । अमित और रिक्शे वाले की बतकही जारी थी । कहाँ एक रिक्शे वाले के मन की बात कोई सुन पाता है । ना वह बेचारा कह पाता है और ना ही कोई सुनने वाला होता है, पर अमित की आदतों में यह शुमार है । वह हर किसी के साथ व्यक्तिगत स्तर पर जाकर उनसे पारिवारिक बातचीत करता है । चुनावों के दौरान लोगों से बातचीत के दौरान उनके मन की बातें भी उसे बड़ी अच्छी लगती है। खैर! बतकही का दौर चल रहा था । कमलेश गौतम जी हाँ ! यही तो नाम बताया था उसने अपना । सीतापुर का रहने वाला था । बातें करता हुआ कमलेश फ़्लैशबैक में चला गया था । किन परिस्थितियों में उसने रिक्शा चलाना शुरू किया । बेटे और भाई की बीमारी ने उसे तोड़कर रख दिया । उसकी सारी ज़मीन बिक गई । फिर भी ना तो वह अपने भाई को बचा पाया और ना ही अपने जवान बेटे को ।थोड़ी बहुत ज़मीन जो बची हुई है वह भी तो रेहन रखी हुई है । रिक्शे से अब उतनी आमदनी कहाँ हो पाती है । ई – रिक्शा वालों ने तो इन्हें कहीं का नहीं छोड़ा ।
उससे बातचीत करते हुए अमित को एहसास हुआ कि बहुत दिनों से जो पीड़ा कमलेश के अंदर दबी पड़ी थी वो धीरे-धीरे बाहर आ रही थी । उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी । आवाज़ में एक गहराई । अब कमलेश की एकमात्र इच्छा कहें या फिर चिंता अब वो अपनी रेहन रखी ज़मीन छुडाने के लिए रिक्शा चला रहा है । उम्र भी धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ रही है । अमित का घर आ गया था । उसने रिक्शे वाले को पैसा दिया और एक लंबी दृष्टि उसके चेहरे पर डाल वापस आ गया अमित फिर से अपनी चाहरदीवारी के अंदर ।
