सम्पादकीय

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चाय बहाना है, साथ ज़रूरी है, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- रिश्तों को गर्माहट देती एक प्याली चाय

एक प्याली चाय 🍵 आप और हम चाय को सिर्फ और सिर्फ चाय पीने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं,

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दाल-रोटी की मजबूरी से सुकून के पलों तक, “मनु की रविवारीय” में आज पढ़िए- 30 साल की नौकरी और ठहर जाने की ख़वाहिश

“आज जाने की ज़िद ना करो । यूँ ही पहलू में बैठे रहो ॥” फ़ैयाज़ हाशमी द्वारा लिखी गई एक

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समय, संवेदना और प्रतिरोध का काव्य-संगीत डॉ. अमित रंजन का काव्य-संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’

प्रो0 (डॉ०) वीरेन्द्र नारायण यादव सदस्य, बिहार विधान परिषद  पूर्व विभागाध्यक्ष हिन्दी सह संकायाध्यक्ष, जेपीयू समकालीन हिन्दी कविता और हिन्दी

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व्हाट्सएप की दुनिया, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए”- सुविधा से शुरू हुआ सफ़र, अब आदत से आगे गुलामी तक

व्हाट्सएप की दुनिया बात थोड़ी पुरानी ज़रूर है, पर उतनी भी पुरानी नहीं कि उसे हम बता न सकें ।

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साहित्य के संत, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- मुंशी प्रेमचंद : जिन्होंने जीवन भी अपनी कहानियों की तरह जिया

अभी दो दिन पहले ही हमने महान कथाकार, उपन्यास सम्राट की 146 वी जयंती मनाई है । आप चाहें उनके

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कॉकरोच आंदोलन: गांधीवाद की छाया या डिजिटल युग का नया प्रतिरोध?

– डॉ. प्रियंका सौरभ भारत में जब भी कोई नया जन-आंदोलन उभरता है, उसे पुराने वैचारिक फ्रेमों में समझने की

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जब दफ़्तर की सड़क बन गई ‘माल रोड’, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- बाबुओं की आधे घंटे की आज़ादी का दिलचस्प व्यंग्य

चलिए आज आपको हम बाबूओं के ‘ माल रोड ‘ का दर्शन कराते हैं । क्यों ? चौंक गए न

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नीट के बवाल के बीच एक बड़ा सवाल: डॉक्टर बनने की राह में संवेदनाएँ कहाँ खो जाती हैं?

– डॉ. सत्यवान सौरभ देश में जब भी नीट (NEET) परीक्षा होती है, उसके बाद केवल परिणामों की नहीं, बल्कि

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फर्जी डिजिटल पत्रकारों पर लगे लगाम, मान्यता प्राप्त सेल्फ रेगुलेटरी बॉडी (SRB) से जुड़े पत्रकारों को ही मिले पहचान

पूर्णेन्दु पुष्पेश, महासचिव, वेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, झारखंड लोकतंत्र का चौथा स्तंभ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज

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