सम्पादकीय

पद से नहीं, व्यक्तित्व से बनती है पहचान, “मनु की रविवारीय में पढ़िए”- रिटायरमेंट के बाद शुरू होती है असली परीक्षा

रिटायरमेंट

अभी कुछ दिन पहले की ही बात है। हमारे एक मित्र का रिटायरमेंट था। मित्र के बनिस्बत सहयोगी कहना ज़्यादा मुनासिब होगा क्योंकि कार्यालयी माहौल में अनौपचारिक रिश्ते कहाँ पनपते हैं ।

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

खैर! इस अवसर पर उनके सम्मान में एक विदाई समारोह का आयोजन किया गया था। आयोजन औपचारिक था, पर ऐसे अवसरों पर थोड़ी-बहुत अनौपचारिकता अपने आप चली आती है। आप चाहें भी तो उसे रोक नहीं सकते। कार्यालयी माहौल में अन औपचारिकता वैसे भी कहाँ पनपती है, सभी कुछ तो औपचारिकता ही होती है , लेकिन भावनाएँ अक्सर उस अनुशासन की सीमाएँ लाँघ जाती हैं जो औपचारिकता के दायरे में आती हैं ।
हाँ, पर इस तरह के मिश्रित माहौल में एक बात हमेशा खल जाती है—नयाचार ( Protocol ) । पता नहीं हमें यह घुट्टी किसने पिला दी है कि कार्यालयी कार्यक्रम के हर अवसर पर हम कुछ निश्चित और नपे तुले शब्दों और वाक्य बोलते हैं, कुछ निश्चित भाव प्रकट करते हैं। यह एक ऐसा नशा है जो उतरता ही नहीं। शायद इसलिए कि हम अवसर के अनुरूप सच बोलने से अधिक, अपेक्षित बातें कहने के अभ्यस्त हो चुके हैं।
खैर, मित्र के विदाई समारोह में उपस्थित सभी लोगों ने अपने-अपने ढंग से उन्हें शुभकामनाएँ दीं। किसी ने उनके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना की, किसी ने उनके सुखमय भविष्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। यह सब सुनते हुए हमारे मन में एक अजीब-सा विचार आया। हम सब कितने भोले हैं। यह जानते हुए भी कि मृत्यु ही अंतिम सत्य है, हम बार-बार भगवान को उन्हीं बातों के लिए परेशान करते रहते हैं जिनका उत्तर शायद उनके पास भी नहीं है। जीवन की लंबाई किसी के हाथ में नहीं होती, लेकिन जीवन की गरिमा अवश्य हमारे हाथ में होती है।
कई वक्ताओं ने उनकी बेदाग़ सेवा का उल्लेख किया और उन्हें सफल कार्यकाल के लिए बधाई दी। सच भी तो यही है कि नौकरी की नहीं जाती, नौकरी निभाई जाती है। पद, वेतन और अधिकार तो समय के साथ मिलते और छूटते रहते हैं, लेकिन व्यक्ति अपने व्यवहार, अपने चरित्र और अपने कर्मों से हमेशा याद रखा जाता है।दूसरों के दिल में अपनी जगह बना जाता है ।
समारोह चलता रहा। अच्छी-अच्छी बातें होती रहीं। तालियाँ बजती रहीं। मुस्कानें बिखरती रहीं। लेकिन मेरे मन में एक अलग ही विचार चल रहा था। वैसे तो कई विचार आ रहे थे, पर एक विचार बार-बार लौटकर सामने खड़ा हो जाता था।
काश! जीवन में ये अच्छी-अच्छी बातें हम एक-दूसरे से उस समय कह पाते जब हम रोज़ साथ काम कर रहे होते। शायद तब हम सब थोड़ा अधिक सुकून से जी पाते। सम्मान केवल विदाई का हिस्सा न बनकर जीवन का हिस्सा होता।
इन्हीं विचारों के बीच मेरे मन में सबसे बड़ा प्रश्न उठा—वह व्यक्ति जो आज सेवानिवृत्त हो रहा है, वह इस समय क्या सोच रहा होगा? कल सुबह जब उसकी आँख खुलेगी तो वर्षों से चली आ रही उसकी दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी होगी। न कार्यालय जाने की जल्दी होगी, न फ़ाइलों का दबाव, न मीटिंग की चिंता, न फ़ोन की घंटियों की बेचैनी।
मैंने उनसे यह प्रश्न पूछा भी, लेकिन शायद वे इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थे। सच तो यह है कि अधिकांश लोग इस प्रश्न के लिए कभी तैयार नहीं होते।
कल से केवल उनकी दिनचर्या ही नहीं बदलेगी। घरवालों का नज़रिया भी थोड़ा बदलेगा। पड़ोसियों का व्यवहार भी बदल सकता है। समाज आपको उसी नज़र से देखता है जैसी आपकी भूमिका होती है। जब भूमिका बदलती है तो दृष्टि भी बदल जाती है। यह कटु लग सकता है, लेकिन जीवन का यही व्यवहारिक पक्ष है।
मेरा प्रश्न फिर भी वहीं खड़ा रहेगा। हो सकता है पहले कुछ दिन, कुछ हफ़्ते या फिर कुछ महीने आप वर्षों की दिनचर्या की थकान उतारने में लगा दें। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन उसके बाद?
यहीं से जीवन की असली परीक्षा शुरू होती है।
यदि आपने स्वयं को नहीं सँभाला, यदि आपने परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को नहीं बदला, यदि आपने अपने भीतर नई रुचियाँ, नए संबंध और नए उद्देश्य विकसित नहीं किए, तो धीरे-धीरे आप स्वयं को अवांछित महसूस करने लगेंगे। उससे भी अधिक दुखद यह होगा कि दूसरे भी आपको उसी नज़र से देखने लगेंगे।
अभी तक आपके परिवार ने, आपके सहकर्मियों ने और आपके आसपास के लोगों ने अपने जीवन को आपकी दिनचर्या के अनुरूप ढाला था। अब आपकी बारी है। अब आपको अपने आसपास के लोगों की दिनचर्या के अनुरूप स्वयं को ढालना होगा।
यदि कहीं अहं बचा है तो उसे यहीं छोड़ देना होगा। यह स्वीकार करना होगा कि जीवन की यह दूसरी पारी पहली पारी से भिन्न है। यहाँ आदेश नहीं, सहयोग काम आएगा; अधिकार नहीं, अपनापन साथ देगा; और पद नहीं, व्यक्तित्व आपकी पहचान बनेगा।
जीवन की दूसरी पारी अचानक शुरू नहीं होती। उसकी नींव पहली पारी के दौरान ही रखी जाती है। जिसने नौकरी करते हुए रिश्तों को समय दिया, अपने भीतर रुचियाँ विकसित कीं, समाज से जुड़ाव बनाए रखा और स्वयं को केवल अपने पद तक सीमित नहीं होने दिया, वही सेवानिवृत्ति के बाद भी उतना ही सक्रिय और प्रसन्न रह पाता है।
सेवानिवृत्ति अंत नहीं है। यह जीवन के एक अध्याय का पूर्ण विराम भी नहीं, बल्कि अगले अध्याय का पहला वाक्य है। फर्क केवल इतना है कि अब कलम आपके हाथ में है और कहानी भी आपकी अपनी है।
सुकून का सफ़र अनवरत चलता रहता है। बस, रास्ते बदलते हैं, पड़ाव बदलते हैं। अंतिम पड़ाव तो हर व्यक्ति की ज़िंदगी में एक दिन आता ही है। उससे पहले तक जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि सार्थक होकर जीना है। शायद यही दूसरी पारी की सबसे बड़ी सफलता है।

मनीष वर्मा “मनु”

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