आप मुस्कुराएँ, आप लखनऊ में हैं- “मनु की रविवारीय” आज पढ़िए- तहज़ीब, नफ़ासत और बदलते दौर के बीच अपनी पहचान तलाशता शहर
आप मुस्कुराएँ आप लखनऊ में हैं । जी हाँ ! मुस्कुराने की वजह तो है ! जब मेरी पोस्टिंग लखनऊ में हुई तो मैं बहुत खुश हुआ ! जब से होश सँभाला लखनऊ के बारे में बहुत कुछ सुनता आया हूँ

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
। सामान्य तौर पर तो लखनऊ की चिकनकारी और यहाँ का खाना । चिकनकारी का तो यह आलम था कि जब कोई लखनऊ से लौट कर आता था तो एक उम्मीद ज़रूर रहती थी कि कुछ तो उपहार ज़रूर आएगा । और भी बहुत कुछ था लखनऊ में ।यह सिर्फ़ चिकनकारी और कबाबों का ही शहर नहीं था बल्कि यह एक ऐसी संस्कृति का शहर रहा है जहाँ बातचीत भी एक कला मानी जाती थी । बातचीत में एक सम्मान झलकता था । पहले आप पहले आप वाली संस्कृति । कोई यहाँ किसी को “ तुम “ कहकर नहीं बुलाता है । चाहे वो कद में आपसे कितना भी छोटा क्यों ना हो “ तुम “ कहना लखनवी संस्कृति के खिलाफ थी । बहुत नाज है लखनऊ वालों को अपनी संस्कृति पर । अगर आपने लखनऊ में बारे में जरा सा भी नकारात्मक टिप्पणी की तो वे छूटते ही कहेंगे – ऐसी बातें कोई लखनऊ वाला कह ही नहीं सकता । ज़रूर लखनऊ से बाहर का कोई होगा ।
शुरुआत में बहुत सावधानी पूर्वक मैं लोगों से बातें किया करता था, पर धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ अब सब कुछ बदल चुका है । लोग अपने से बड़े उम्र के लोगों को भी उसके कद को देखते हुए “ तुम “ कहकर संबोधित करते हैं । वो बड़ों को सम्मान देने वाली संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है । “आप “ शब्द यहाँ केवल संबोधन ही नहीं बल्कि लखनऊ की संस्कृति का एक अहम् हिस्सा थी ।मेरे व्यक्तिगत विचार से भी शायद ही कोई ऐसी भाषा हो जिसमें अपने से बड़ों के लिए सम्मान ना दर्शाया जाता है ।
भाषा केवल संवाद का माध्यम ही नहीं होती हैं बल्कि सामाजिक संस्कारों का प्रतीक भी होती हैं ।
खैर ! लखनऊ की वो तहज़ीब, वो नफ़ासत और नज़ाकत , पर अब देखने को नहीं मिलती है , जिसके लिए लखनऊ जाना जाता है । यूँ कहें या तो विलुप्त हो गई है या फिर विलुप्त होने के कगार पर है । इस संस्कृति के वाहक आपको बहुत कम लोग मिलेंगे लखनऊ में । इसकी एक वजह शायद यह भी हो सकती है कि यहाँ अब बाहर से आए हुए लोगों की संख्या बढ़ रही है । दरअसल दो हिस्सों में शहर बंट गया है । गोमती नदी के इस पार पुराना लखनऊ और उस पार नया लखनऊ । रही सही कसर तो बाजारीकरण पूरा कर देती । अमुमन हर शहर की यही कहानी है ।
खैर! कुछ बातें जो मैंने लखनऊ के संदर्भ में पढ़ी है जिसका ज़िक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ कि नवाबों के समय में लखनऊ के लोगों को टैक्स बिल्कुल भी देना नहीं पड़ता था जबकि लखनऊ से बाहर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग जी तोड़ मेहनत करते थे और टैक्स चुकाते थे । इसलिए इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि लखनऊ के लोगों की स्वाभाविक पसंद यहाँ के नवाबों के लिए थी । पैसे की कमी उन्हें थी नहीं । अमुमन लोगों के रहने का स्तर उच्च स्तर का और बढ़िया था । वैसे भी जब पैसा उपर से नीचे तक निर्बाध गति से बहता है तो लोग बाग आसान ज़िंदगी के आदी हो जाते हैं । उनके जीवन का उद्देश्य बदल सा जाता है और वो जीवन की अच्छी चीज़ों की ओर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं । वो तब गुणवत्तापूर्ण जीवन जीना चाहते हैं । वो अपना पूरा ध्यान तहज़ीब, नज़ाकत और नफ़ासत की ओर देते हैं बनिस्बत मेहनत करने के । उनकी इस आदत ने धीरे-धीरे उनके दृष्टिकोण को बदल दिया । वो आराम के जीवन जीने के आदी हो गए । हर काम को आराम से करना उनकी आदत में शुमार हो गया ।
लखनऊ के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह से जुड़ा है। 1856 में अंग्रेज़ों ने अवध का विलय कर लिया और वाजिद अली शाह को लखनऊ से हटाकर कोलकाता भेज दिया। वहाँ उन्होंने मटियाबुर्ज में अपना निवास बनाया। निर्वासन के बावजूद उन्होंने कला, संगीत, नृत्य और साहित्य के संरक्षण का कार्य जारी रखा और अपने आसपास एक ऐसी सांस्कृतिक दुनिया बसाई जिसमें उन्हें अपने प्रिय लखनऊ की झलक मिल सके। जीवन के अंतिम दिनों तक वे वहीं रहे, लेकिन उनके साथ लखनऊ की एक पूरी सांस्कृतिक परंपरा भी मानो कोलकाता तक पहुँच गई।
लखनऊ की असली पहचान शायद उसके संतुलन में है जहाँ अतीत की तहज़ीब, उसकी नफ़ासत और नज़ाकत और वर्तमान की स्थिति के बीच एक संवाद । थोड़े बदलाव के साथ लखनऊ आज भी अपनी पुरानी पहचान को क़ायम रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा है । परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम है । कोई भी इससे अछूता नहीं रह सकता है।
मनीष वर्मा “मनु”
