सम्पादकीय

फॉलोअर्स की भूख और रिश्तों की नीलामी

डॉ. सत्यवान सौरभ

डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति के नए दरवाजे खोले हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात दुनिया तक पहुँचाने का अवसर दिया है। पहले जहां सूचना और मनोरंजन के साधन

डाॅ.सत्यवान सौरभ

सीमित थे, वहीं आज कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल फोन के जरिए वीडियो बना सकता है, ब्लॉग लिख सकता है और लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। यह बदलाव लोकतांत्रिक भी है और प्रेरणादायक भी। लेकिन हर बदलाव के साथ कुछ नई चुनौतियाँ भी जन्म लेती हैं।

आज सोशल मीडिया की दुनिया में लोकप्रियता की एक नई परिभाषा बन चुकी है—फॉलोअर्स, लाइक्स, शेयर और व्यूज़। जितने ज्यादा ये आंकड़े होते हैं, उतना ही किसी व्यक्ति को सफल माना जाता है। इसी होड़ ने कई कंटेंट क्रिएटर्स को ऐसी राह पर ला खड़ा किया है, जहां निजी जीवन की मर्यादाएं भी कंटेंट का हिस्सा बनती जा रही हैं।

बीते कुछ वर्षों में एक नया ट्रेंड तेजी से उभरा है—पारिवारिक झगड़ों और निजी विवादों को कैमरे के सामने लाकर सोशल मीडिया पर साझा करना। पति-पत्नी के विवाद, भाई-बहन के मतभेद, सास-बहू की तकरार या परिवार के अंदर की छोटी-छोटी बहसें—जो पहले घर की चारदीवारी में सुलझा ली जाती थीं—अब वीडियो और पोस्ट के रूप में लाखों दर्शकों के सामने परोसी जा रही हैं।

कई यूट्यूबर्स और ब्लॉगर इसे “रियल लाइफ कंटेंट” का नाम देते हैं। उनका तर्क होता है कि दर्शक वास्तविकता देखना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर वास्तविक घटना को सार्वजनिक करना जरूरी है? क्या निजी रिश्तों को दर्शकों की जिज्ञासा के लिए खोल देना उचित है?

असल में सोशल मीडिया का एल्गोरिथ्म भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। जिस कंटेंट में विवाद, भावनात्मक प्रतिक्रिया या सनसनी होती है, वह तेजी से वायरल होता है। लोग ऐसे वीडियो पर ज्यादा कमेंट करते हैं, अपनी राय देते हैं और कभी-कभी पक्ष या विपक्ष में बहस भी करते हैं। यही कारण है कि कुछ क्रिएटर्स जानबूझकर ऐसे विषय चुनते हैं जो लोगों की भावनाओं को भड़का सकें।

दुर्भाग्य की बात यह है कि कई बार ये झगड़े वास्तविक होते हैं और परिवार के सदस्यों की निजता दांव पर लग जाती है। एक छोटी सी तकरार को कैमरे के सामने लाकर बड़ा मुद्दा बना दिया जाता है। इससे न केवल रिश्तों की गरिमा प्रभावित होती है, बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों—विशेषकर बच्चों—पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।

कुछ मामलों में तो यह भी देखने में आया है कि विवादों को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है या फिर पूरी तरह से स्क्रिप्टेड होता है। यानी झगड़ा असली नहीं होता, लेकिन उसे असली दिखाने की कोशिश की जाती है ताकि दर्शकों का ध्यान खींचा जा सके। यह स्थिति मनोरंजन और वास्तविकता के बीच की रेखा को धुंधला कर देती है।

सोशल मीडिया के इस दौर में “वायरल” होना ही सफलता का पर्याय बन गया है। जब किसी वीडियो को लाखों व्यूज़ मिलते हैं और हजारों नए फॉलोअर्स जुड़ते हैं, तो क्रिएटर को लगता है कि उसने सही रास्ता चुना है। लेकिन यह लोकप्रियता अक्सर क्षणिक होती है। जिस विवाद ने एक दिन दर्शकों का ध्यान खींचा, वही अगले दिन किसी और नए विवाद से दब जाता है।

इस प्रवृत्ति का एक सामाजिक पहलू भी है। जब दर्शक बार-बार ऐसे कंटेंट देखते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें यह सामान्य लगने लगता है कि निजी रिश्तों को सार्वजनिक मंच पर लाकर चर्चा का विषय बनाया जाए। इससे समाज में गोपनीयता और मर्यादा की भावना कमजोर पड़ सकती है।

हमारे समाज में परिवार को हमेशा एक मजबूत संस्था माना गया है। परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, विश्वास और आपसी समझ का आधार भी है। जब परिवार के अंदर की समस्याओं को सार्वजनिक तमाशा बना दिया जाता है, तो यह उस भरोसे को कमजोर करता है जो रिश्तों की नींव होता है।

इसके अलावा, सोशल मीडिया पर आने वाले दर्शकों में बड़ी संख्या युवा और किशोरों की भी होती है। वे जो कुछ देखते हैं, उससे प्रभावित होते हैं। अगर वे बार-बार यह देखेंगे कि लोकप्रियता पाने के लिए निजी विवादों को सार्वजनिक करना सामान्य बात है, तो उनके मन में भी यही धारणा बन सकती है कि जीवन में सफलता के लिए किसी भी हद तक जाना स्वीकार्य है।

यह भी सच है कि सभी कंटेंट क्रिएटर्स ऐसे नहीं होते। बहुत से यूट्यूबर्स, ब्लॉगर और डिजिटल क्रिएटर्स ऐसे भी हैं जो ज्ञानवर्धक, रचनात्मक और सकारात्मक सामग्री प्रस्तुत करते हैं। शिक्षा, विज्ञान, कला, संस्कृति, यात्रा और सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले अनेक लोग सोशल मीडिया को एक सकारात्मक मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके प्रयास यह साबित करते हैं कि लोकप्रियता पाने के लिए विवाद और ड्रामा ही एकमात्र रास्ता नहीं है।

असल सवाल जिम्मेदारी का है। जब किसी के पास हजारों या लाखों लोगों तक पहुंचने की ताकत होती है, तो उसके साथ एक सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है। कंटेंट क्रिएटर्स को यह समझना चाहिए कि उनकी सामग्री केवल मनोरंजन ही नहीं करती, बल्कि लोगों की सोच और दृष्टिकोण को भी प्रभावित करती है।

दर्शकों की भी इसमें भूमिका कम नहीं है। आखिर वही तय करते हैं कि किस प्रकार का कंटेंट ज्यादा देखा जाएगा और किसे नजरअंदाज किया जाएगा। अगर दर्शक केवल सनसनी और विवाद वाले वीडियो को ही बढ़ावा देंगे, तो स्वाभाविक है कि ऐसे कंटेंट की संख्या बढ़ती जाएगी। लेकिन अगर वे रचनात्मक और सकारात्मक सामग्री को अधिक समर्थन देंगे, तो डिजिटल दुनिया का माहौल भी बदल सकता है।

आज जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया के उपयोग में संतुलन और समझदारी लाई जाए। निजी जीवन की सीमाएं तय की जाएं और यह समझा जाए कि हर घटना को सार्वजनिक करना आवश्यक नहीं होता। लोकप्रियता और फॉलोअर्स का महत्व अपनी जगह है, लेकिन रिश्तों की गरिमा और व्यक्तिगत सम्मान उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

अंततः यह याद रखना जरूरी है कि सोशल मीडिया एक साधन है, लक्ष्य नहीं। इसका उपयोग ज्ञान, संवाद और सकारात्मक बदलाव के लिए किया जा सकता है। लेकिन जब यह केवल लोकप्रियता की अंधी दौड़ में बदल जाता है, तो इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगते हैं।

फॉलोअर्स और व्यूज़ की यह भूख अगर इसी तरह बढ़ती रही, तो कहीं ऐसा न हो कि एक दिन लोग लोकप्रिय तो हो जाएं, लेकिन अपने ही रिश्तों और मूल्यों से दूर हो जाएं। इसलिए समय रहते यह समझना जरूरी है कि सच्ची सफलता वही है, जो सम्मान और संवेदनशीलता के साथ हासिल की जाए—न कि रिश्तों की नीलामी करके।

 

डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

 

( आलेख मे व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)

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