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‘सम्मान समारोह सह काव्य पाठ’ में प्रो० (डॉ०) पंकज कुमार को लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान, डॉ० अमित रंजन के ‘मौसिकी’ का हुआ लोकार्पण

छपरा, 9 अगस्त। श्री लक्ष्मीनारायण यादव अध्ययन केन्द्र, रामजयपाल कॉलेज, छपरा में रविवार को आयोजित ‘सम्मान समारोह सह काव्य पाठ’ साहित्य, शिक्षा और सामाजिक सरोकारों का यादगार आयोजन बन गया। समारोह में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के निवर्तमान आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो० (डॉ०) पंकज कुमार को उनके दीर्घ अकादमिक योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान से सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर डॉ० अमित रंजन के सद्यः प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘मौसिकी: अहसासों का आसमान’ का लोकार्पण हुआ, जबकि वरिष्ठ कवि एवं अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा के निवर्तमान आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो० (डॉ०) दिनेश कुशवाह ने अपने काव्य-पाठ से श्रोताओं को गहरे मानवीय सरोकारों से जोड़ा।

समारोह के आयोजक प्रो० (डॉ०) वीरेन्द्र नारायण यादव, आचार्य, अध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा सह विधान परिषद सदस्य, ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक समृद्धि केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक चेतना, साहित्यिक संवेदना और अपने श्रेष्ठजनों के प्रति सम्मान से निर्धारित होती है। उन्होंने कहा कि आज का आयोजन एक साथ तीन महत्वपूर्ण उपलब्धियों का साक्षी है—एक ऐसे शिक्षाविद् का सम्मान, जिन्होंने पीढ़ियों को अकादमिक दृष्टि दी; एक वरिष्ठ कवि की उपस्थिति, जिनकी रचनाएं समाज के हाशिये पर खड़े मनुष्य की आवाज बनती हैं; और एक नये काव्य-संग्रह का लोकार्पण, जो प्रेम, संवेदना और जीवन के विविध रंगों को शब्द देता है।

प्रो० यादव ने कहा कि छपरा की धरती साहित्य और ज्ञान की समृद्ध परंपरा वाली धरती है और यहां ऐसे आयोजनों की निरंतरता नई पीढ़ी में पढ़ने, सोचने और संवाद करने की संस्कृति को मजबूत करेगी। उन्होंने समारोह में उपस्थित साहित्यकारों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, संस्कृतिकर्मियों और साहित्यप्रेमियों का स्वागत करते हुए कहा कि सम्मान तभी सार्थक है, जब वह समाज में ज्ञान और संवेदना के प्रति सम्मान की नई जमीन तैयार करे।

सम्मान जीवन-यात्रा का नहीं, विचार-यात्रा का पड़ाव है : पंकज कुमार

सम्मान ग्रहण करने के बाद अपने संबोधन में प्रो० (डॉ०) पंकज कुमार ने सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि किसी शिक्षक के लिए इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है कि उसके विद्यार्थी और समाज उसकी बौद्धिक यात्रा को याद रखें। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने की जगह नहीं, बल्कि प्रश्न करने, असहमति को स्वीकार करने और बेहतर समाज की कल्पना करने की प्रयोगशाला है।
उन्होंने कहा कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन अंततः सत्ता को समझने से अधिक मनुष्य, समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने का अनुशासन है। आज जब सूचनाओं की अधिकता के बावजूद संवाद का संकट दिखाई देता है, तब साहित्य और सामाजिक विज्ञान की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने युवा पीढ़ी से पुस्तकों से जुड़ने, तर्कशील बनने और अपने समय के प्रश्नों से आंख मिलाकर बात करने का आह्वान किया।
प्रो० पंकज कुमार ने आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह के समारोहों में सम्मान व्यक्ति का नहीं, बल्कि ज्ञान, शिक्षा और मानवीय मूल्यों का सम्मान होता है।

दिनेश कुशवाह की कविताओं में इतिहास के हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज

समारोह के प्रमुख आकर्षण रहे वरिष्ठ कवि प्रो० (डॉ०) दिनेश कुशवाह। उनके दो चर्चित कविता-संग्रह ‘इसी काया में मोक्ष’ और ‘इतिहास में अभागे’ प्रकाशित हैं। उनकी कविताओं में प्रेम, स्त्री, श्रम, सामाजिक विषमता, इतिहास और हाशिये के मनुष्य के सवाल प्रमुखता से आते हैं।
उनकी कविता ‘इतिहास में अभागे’ इतिहास लेखन के उस पक्ष पर सवाल उठाती है, जिसमें निर्माण करने वाले श्रमिक, पीड़ित और वंचित लोग अक्सर इतिहास के पन्नों से गायब कर दिए जाते हैं। कविता का अत्यंत प्रभावशाली छोटा-सा अंश है—“इतिहास के नाम पर मुझे / सबसे पहले याद आते हैं वे अभागे / जो बोलना जानते थे।”
वहीं ‘इसी काया में मोक्ष’ में कवि मनुष्य के भीतर की सुंदरता और आत्मीय संबंध की तलाश करते हुए उस मनुष्य की आकांक्षा व्यक्त करता है, जिसे पाकर जीवन की सार्थकता का अनुभव हो। कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं—“बहुत दिनों से मैं / किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ / जिसे देखते ही लगे / इसी से तो मिलना था।”

कुशवाह की रचनाओं की विशेषता यह है कि उनका प्रेम भी सामाजिक है और उनका सामाजिक सरोकार भी मानवीय। ‘इतिहास में अभागे’ में वे इतिहास के केंद्र से बाहर कर दिए गए लोगों की स्मृति को सामने लाते हैं, जबकि ‘इसी काया में मोक्ष’ मनुष्य के भीतर मनुष्य की तलाश करती है। उनके रचना-संसार में ‘हर औरत का एक मर्द है’, ‘प्रेम में पड़ी हुई लड़की’, ‘महिला सरपंच के निर्वसन घुमाए जाने पर’, ‘हमारा खून लाल क्यों है?’ जैसी कविताओं के शीर्षक भी उनकी सामाजिक और मानवीय प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं।

मौसिकी’ के लोकार्पण ने समारोह को दिया काव्यात्मक आयाम

समारोह में डॉ० अमित रंजन के काव्य-संग्रह ‘मौसिकी: अहसासों का आसमान’ का विधिवत लोकार्पण किया गया। पुस्तक में ग़ज़ल, कविता और गीतों के माध्यम से प्रेम, विरह, रिश्तों, सामाजिक सरोकारों और जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को अभिव्यक्ति दी गई है। संग्रह का केंद्रीय भाव मानवीय अनुभूतियों को शब्दों के संगीत में बदलना है। डॉ० अमित रंजन ने इस अवसर पर अपनी चर्चित कविता ‘स्त्रीदेह की जिरह में इंसानियत’ का पाठ किया। कविता में स्त्री को केवल देह के रूप में देखने वाली मानसिकता के विरुद्ध मानवीय गरिमा का सवाल उठाया गया। कविता का मूल आग्रह यह था कि स्त्री की देह पर बहस करने से पहले उसके मनुष्य होने के अधिकार, उसकी स्वतंत्रता, उसकी पीड़ा और उसकी अस्मिता को समझा जाए। कविता के पाठ के दौरान सभागार में गंभीर सन्नाटा छा गया और कई स्थानों पर श्रोताओं ने तालियों से कवि की संवेदना का स्वागत किया। कविता ने स्त्री-विमर्श को महज देह-विमर्श से आगे ले जाकर उसे इंसानियत और बराबरी के प्रश्न से जोड़ने का प्रयास किया।
साहित्य में मनुष्य की तलाश ही

सबसे बड़ी प्रतिबद्धता : वक्ताओं का मत

समारोह में प्रो० लाल बाबू यादव ने कहा कि आज के समय में जब समाज अनेक प्रकार के विभाजनों से गुजर रहा है, साहित्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है। पंकज कुमार का अकादमिक जीवन, दिनेश कुशवाह की सामाजिक चेतना और अमित रंजन की भाव-संवेदना—तीनों ने आयोजन को ज्ञान, विचार और कविता के त्रिवेणी-संगम में बदल दिया।

धन्यवाद ज्ञापन‌ जेपीयू की पूर्व‌ संकायाध्यक्ष, आचार्य और अध्यक्ष प्रो० (डॉ०) उषा कुमारी ने किया और संचालन नदीम अहमद द्वारा किया गया। मौके पर समन्वयक प्रो० (डॉ०) सिद्धार्थ शंकर, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा तथा प्रो० (डॉ०) अशोक कुमार सिन्हा, विभागाध्यक्ष, हिन्दी, राजेन्द्र कॉलेज, छपरा सहित साहित्य और शिक्षा जगत से जुड़े लोगों की उपस्थिति ने आयोजन को गरिमा प्रदान की।
पूरे समारोह में सम्मान, संवाद और कविता एक-दूसरे के पूरक दिखाई दिए। मंच से निकली कविताओं में प्रेम था, पीड़ा थी, प्रतिरोध था और सबसे बढ़कर मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने की बेचैनी थी। यही बेचैनी समारोह की सबसे बड़ी उपलब्धि बनकर सामने आई।

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