सम्पादकीय

चाय बहाना है, साथ ज़रूरी है, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- रिश्तों को गर्माहट देती एक प्याली चाय

एक प्याली चाय 🍵

आप और हम चाय को सिर्फ और सिर्फ चाय पीने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, पर शायद हम भूल जाते हैं इसके गुणों के बारे में। अगर आपको लगता है कि हम यहाँ इसके औषधीय गुणों के

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

बारे में बात कर रहे हैं तो शायद आप ग़लत हैं। हम यहाँ ऐसी कोई बात नहीं करने जा रहें हैं।
वैसे चाय हमारे यहाँ की चीज़ नहीं है। लगभग 4000 साल पहले ही चाय किसी ना किसी रूप में चीन में आ चुकी थी। पुर्तगाली व्यापारी और पादरियों ने इसे युरोप में लाया। बाद में यह वहाँ की एक लोकप्रिय पेय हो गई । अंग्रेज़ों को चाय चीन से मँगानी पड़ती थी जो उन्हें बहुत महंगी पड़ती थी । 1820-30 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने असम के जंगलों में चाय के पौधे लगाए और वहाँ खेती शुरू की । पहले भारतीय चाय कहाँ पीते थे ! उन्हें तो अंग्रेज़ों ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद रेलवे स्टेशन पर मुफ्त चाय पिलाकर और जगह जगह पर विज्ञापन देकर इसे आम भारतीयों की आदत बना दिया ।अब तो हम लोग चाय के इतने दीवाने हो चुके हैं कि ऐसा लगता है मानो चाय प्राकृतिक रूप से हमारे यहाँ की ही हो। हमने तो चाय को एक अलग ही रूप दिया है। हम तो भाई मसाला चाय पीने वाले लोग हैं। ठीक वैसे ही हमने चाय का मसालाकरण कर दिया है जिस प्रकार हमने चायनीज डिसेज का किया। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में विश्व की चुनिंदा चाय उपजती है। तभी तो वहाँ की चाय को शैम्पेन आफ़ टी कहा जाता है।
खैर! कुछ दिन पहले कहीं किसी पत्रिका में हमने पढ़ा था जहाँ एक औरत जिसकी शादी के लगभग 20 साल हो गए हैं। एक सोलह साल का बेटा भी है। वो एक रिलेशनशिप सलाहकार से अपनी व्यक्तिगत परेशानी साझा करते हुए कहती है—हमारे और हमारे पति के बीच हर छोटी-छोटी बातों पर झगड़े हो जाते हैं। हमारी विचारधारा, जीवनशैली और रहन सहन भी एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं । जिस वजह से हमारे रिश्ते में एक अजीब सी घुटन है ।शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो ,जब हम दोनों एक-दूसरे से झगड़ा नहीं करते हैं।
रिलेशनशिप सलाहकार ने तो अपने तरीके से और अपने अनुभव के आधार पर उसे समझाने की कोशिश की । स्वाभाविक है दोनों ही अलग-अलग माहौल से आते हैं । उनकी शिक्षा, उनकी परवरिश एक भिन्न माहौल में हुई है । सोचने समझने का नज़रिया अलग हो सकता है, पर इसका मतलब यह नहीं कि बात बात पर झगड़ा ही हो । एक दूसरे से संवाद करें । संवादहीनता की स्थिति कभी ना आने दें ।
पर मेरा अपना मानना है कि सुबह सुबह की चाय पत्नी के साथ अपने सारे अहं को किनारे रख साथ साथ पीने से बहुतेरे समस्या का हल निकल सकता है। और अगर चाय आपने बना कर दी हो तो फिर कहना ही क्या?
सोचिए, शादी के बीस साल बीत चुके हैं । यह कोई छोटा समय तो है नहीं। बीस सालों में साथ-साथ चलते हुए जीवन के कितने ही मौसम बदल जाते हैं। इस सफ़र में कितने पड़ाव आते और चले जाते हैं । बच्चों का बचपन निकलकर किशोरावस्था में पहुँच जाता है। घर बदल जाते हैं, जिम्मेदारियाँ बदल जाती हैं, जरूरतें बदल जाती हैं, लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता अगर वहीं का वहीं खड़ा रह जाए तो फिर शायद शिकायतें जन्म लेने लगती हैं। बीस सालों का लम्बा सफ़र और अब तक आप कदमताल नहीं कर पाए। पति पत्नी दोनों के लिए दुःखद है।
ऐसे में सुबह सुबह की एक प्याली चाय शायद कोई बहुत बड़ा इलाज नहीं है, लेकिन बातचीत की शुरुआत तो हो सकती है। Ice Break तो किया ही जा सकता है ।दिन शुरू होने से पहले कुछ पल एक-दूसरे के नाम किए जा सकते हैं। चाय की प्याली हाथ में हो और सामने वही व्यक्ति बैठा हो जिसके साथ आपने जीवन के बीस साल गुजारे हैं, तो शायद बातचीत के लिए किसी लाइफ कोच की जरूरत न पड़े। कभी-कभी रिश्तों को बड़े-बड़े समाधान नहीं चाहिए होते, बस थोड़ा-सा समय चाहिए होता है।
और अगर चाय आपने बनाकर दी हो तो फिर कहना ही क्या? उसमें चाय से कहीं ज्यादा आपकी परवाह घुली होगी। पत्नी के हाथ में चाय की प्याली देते हुए अगर पति सिर्फ इतना पूछ ले—“चाय ठीक बनी है?” तो शायद सवाल चाय का नहीं, रिश्ते का होता है। और पत्नी अगर मुस्कुराकर कह दे—“हाँ, ठीक है।” तो समझिए सुबह की शुरुआत अच्छी हो गयी।
दुखी लोग इस नुस्ख़े को आज़मा कर तो देखें। यहाँ इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि आप चाय पीते हैं या नहीं। असली बात चाय नहीं, साथ बैठना है। असली बात यह है कि दिन की भागदौड़ शुरू होने से पहले दो लोग कुछ मिनट एक-दूसरे के लिए निकाल लें। शायद कई शिकायतें वहीं खत्म हो जाएँगी जिन्हें हम बरसों से ढोते चले आ रहे हैं।
वैसे अगर आप व्यक्तिगत तौर पर मुझसे पूछें तो सुबह की चाय को मैं साफ़ तौर पर इंकार कर दूँगा। मैं शायद उन विरलों में हूँ जिसे सुबह की चाय बिल्कुल भी नहीं भाती है। मेरे लिए सुबह की चाय कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसके बिना दिन शुरू ही न हो सके। लेकिन अगर पत्नी ने सुबह की चाय की इच्छा जताई तो उसकी इच्छा को पूरी करने में मुझे थोड़ी भी देर नहीं लगती है।
आखिर रिश्ते शायद इसी का नाम हैं। हर चीज़ इसलिए नहीं की जाती कि हमें वह पसंद है। कई चीज़ें इसलिए की जाती हैं क्योंकि सामने वाले को उनसे खुशी मिलती है। और अगर किसी छोटी-सी कोशिश से आपके अपने को अच्छा लगता है, तो फिर उस कोशिश में हर्ज़ ही क्या है?
सुबह की वह एक प्याली चाय इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उसमें चाय से ज्यादा भावना होती है। वह कहता है—“मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ।” वह कहती है—“तुम्हारी पसंद मेरे लिए मायने रखती है।” और कभी-कभी बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती है।
दिन की शुरुआत सही ढंग से होती है तो फिर पूरा दिन सही रहता है। शायद सुबह की वह एक अदद चाय की प्याली इसी सही शुरुआत का बहाना भर है। चाय खत्म हो जाती है, प्याली खाली हो जाती है, लेकिन अगर उस दौरान दो लोगों के बीच थोड़ी-सी गर्माहट बची रह जाए तो समझिए चाय अपना काम कर गयी।
आखिर चाय की प्याली में ऐसा भी क्या है?
कुछ नहीं।
बस थोड़ी-सी चाय, थोड़ी-सी गर्माहट और ढेर सारा साथ।

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘✒️

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