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जेंडर संवेदीकरण: सुरक्षित शिक्षण एवं उपचारात्मक वातावरण की ओर बिहार के गाँवों-कस्बों से उठती समानता की एक नई भोर

शिक्षा किसी भी समाज की सबसे कोमल किंतु सबसे शक्तिशाली नींव होती है। परंतु यह नींव तभी सुदृढ़ बनती है जब कक्षा का प्रत्येक कोना बालक और बालिका—दोनों के लिए समान रूप से सुरक्षित, सम्मानजनक और सहज हो। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ परंपरा और आधुनिकता प्रतिदिन एक-दूसरे से संवाद करती हैं, जेंडर संवेदीकरण का प्रश्न अब विलासिता नहीं, अनिवार्यता बन चुका है। यह लेख उसी का विवरण प्रस्तुत करता है।

सुरक्षित कक्षा वही है जहाँ प्रश्न पूछने से पहले भय नहीं, जिज्ञासा जागे।

जब आँकड़े कहते हैं:-

जनगणना 2011 के अनुसार बिहार में महिला साक्षरता दर लगभग 51.5 प्रतिशत रही, जबकि पुरुष साक्षरता दर 71.2 प्रतिशत के आसपास थी। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) यह भी बताता है कि राज्य में 20-24 वर्ष आयु-वर्ग की लगभग 40 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो गया था। ये संख्याएँ पन्नों पर शांत दिखती हैं, परंतु धरातल पर वे हज़ारों अधूरी छोड़ी गई कॉपियों, बीच में टूटे सपनों और खामोश विदाइयों की गवाह हैं। परंतु यही बिहार वह भूमि भी है जहाँ से परिवर्तन की सबसे प्रेरक गाथाएँ भी उठी हैं—और यहीं से इस लेख की असली कहानी आरंभ होती है।

दो पहियों पर सवार आत्मविश्वास:-

मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना — गतिशीलता से गरिमा तक का सफर।

वर्ष 2006 में आरंभ हुई ‘मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ ने कक्षा नौ में पढ़ने वाली बालिकाओं को साइकिल खरीदने हेतु सीधी आर्थिक सहायता दी। परिणाम केवल नामांकन के आँकड़ों में नहीं दिखा—वह गाँव की उन पगडंडियों पर भी दिखा जहाँ पहली बार नीली पोशाक पहने किशोरियाँ साइकिल चलाते हुए विद्यालय जाने लगीं। यह दृश्य साधारण नहीं था। जिस समाज में लड़की का दायरा देहरी तक सीमित माना जाता था, वहाँ यह साइकिल उसकी सार्वजनिक उपस्थिति, उसके आत्मविश्वास और उसके अधिकार का प्रतीक बन गई।

“साइकिल ने पहिए नहीं घुमाए, उसने सोच के पहिए घुमाए।”

जब माँ बोलना सीखती है, बेटी पढ़ना सीखती है:-

जीविका समूहों की बैठकें — जहाँ मौन टूटता है, वहीं समानता का बीज पड़ता है।

‘जीविका’ के अंतर्गत गठित महिला स्वयं सहायता समूहों ने बिहार के ग्रामीण परिदृश्य को भीतर से बदल दिया है। इन समूहों की साप्ताहिक बैठकें केवल बचत और ऋण की चर्चा तक सीमित नहीं रहतीं—वे अनजाने में ही संवेदीकरण की पाठशाला बन जाती हैं, जहाँ महिलाएँ पहली बार बाल विवाह, घरेलू हिंसा और बेटियों की शिक्षा पर खुलकर बोलती हैं। इसी प्रकार वर्ष 2006 में बिहार पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने वाला देश का पहला राज्य बना। जिस गाँव की मुखिया स्वयं एक महिला हो, वहाँ विद्यालय में शौचालय या सुरक्षा की माँग को नज़रअंदाज़ करना असंभव हो जाता है।

एक टूटा दरवाज़ा की मरम्मत और एक बचाई गई शिक्षा — मुजफ्फरपुर का एक दृष्टांत:-

मुजफ्फरपुर के एक मध्य विद्यालय की घटना है। कक्षा आठ की एक छात्रा लगातार तीन दिनों से अनुपस्थित थी। परंपरागत सोच होती—’लड़की है, शायद पढ़ाई छोड़ दी।’ किंतु विद्यालय की एक संवेदनशील शिक्षिका स्वयं उसके घर गईं और पाया कि बालिका मासिक धर्म के कारण विद्यालय नहीं आ रही थी, क्योंकि वहाँ के शौचालय का दरवाज़ा टूटा हुआ था। दरवाज़े की मरम्मत, सैनिटरी नैपकिन की उपलब्धता, और एक शिक्षिका का धैर्यपूर्वक दिया गया भरोसा—इन तीन छोटे किंतु निर्णायक कदमों ने एक छात्रा को स्थायी विद्यालय-त्याग से बचा लिया।

सुरक्षा के साथ-साथ उपचार भी:

सुरक्षा हिंसा को रोकती है; उपचार उसके घाव को भरता है।

सच्चा सुरक्षित वातावरण वहीं बनता है जहाँ सुरक्षा के साथ-साथ उपचार की भी व्यवस्था हो। आघात-संवेदी (Trauma-informed) दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि किसी पीड़ित बालिका या बालक से यह पूछने के बजाय कि ‘तुम्हारे साथ क्या गलत है’, हमें यह पूछना चाहिए कि ‘तुम्हारे साथ क्या घटित हुआ’। गोपनीयता, पीड़ित-दोषारोपण से मुक्ति, प्रशिक्षित परामर्शदाता की उपलब्धता, और बाल विवाह अथवा हिंसा से बचाई गई किशोरी की विद्यालय में सम्मानजनक पुनर्वापसी—ये सभी मिलकर एक विद्यालय को केवल ‘सुरक्षित’ नहीं, बल्कि ‘उपचारात्मक’ भी बनाते हैं।

परिवर्तन की राह:-

प्रत्येक विद्यालय में सक्रिय जेंडर एवं बाल-संरक्षण समिति, शिक्षकों का नियमित संवेदीकरण प्रशिक्षण, विद्यालय प्रबंध समिति में माताओं की सहभागिता, तथा शिकायत एवं परामर्श की सुलभ व्यवस्था—ये चारों मिलकर उस परिवर्तन की नींव रखते हैं जिसकी बिहार को आवश्यकता है। यह परिवर्तन एक दिन में नहीं आएगा, परंतु प्रत्येक साइकिल, प्रत्येक मरम्मत किया गया दरवाज़ा, और प्रत्येक सुनी गई आवाज़ इस दिशा में एक ठोस कदम है।

वैशाली की धरती ने विश्व को गणतंत्र की संकल्पना दी थी। यदि यह भूमि गणतंत्र का उद्गम स्थल बन सकती है, तो इसका प्रत्येक विद्यालय समानता का उद्गम स्थल क्यों नहीं बन सकता? जेंडर संवेदीकरण किसी वर्ग के विरुद्ध संघर्ष नहीं, अपितु समूचे समाज के पक्ष में किया गया एक शांत, किंतु दृढ़ निवेश है।

— श्री प्रमोद कुमार, शिक्षाविद्

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