सम्पादकीय

शैक्षणिक पत्रिकाएँ वे माध्यम हैं जिनके सहारे वैज्ञानिक शोध-विचारों का आदान-प्रदान होता है और विषयगत ज्ञान जन-जन तक पहुँचता है

संकलनकर्ता- श्री प्रमोद कुमार, शिक्षाविद।

प्रस्तावना: शैक्षणिक पत्रिका (जिसे विद्वत् पत्रिका, सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका या रेफ़री पत्रिका भी कहते हैं) एक आवधिक प्रकाशन है, जिसमें किसी विशेष शैक्षणिक विषय से जुड़े शोध-निष्कर्ष और लेख छपते हैं। ये मौलिक शोध-रिपोर्ट, साहित्य-समीक्षा, पुस्तक-समीक्षा, सामाजिक टिप्पणी, केस-अध्ययन, शोध-पद्धति संबंधी लेख, विचार या चर्चा-आलेख, संक्षिप्त रिपोर्ट या पत्र और संपादकीय के रूप में हो सकते हैं। यद्यपि यह एक आवधिक प्रकाशन है, फिर भी यह समाचार-पत्र या सामान्य पत्रिका नहीं है। यह किसी पेशे, व्यापार या उद्योग की प्रवृत्तियों और समाचारों पर आधारित व्यावसायिक प्रकाशन या ट्रेड जर्नल भी नहीं है। इस संक्षिप्त आलेख का उद्देश्य शैक्षणिक पत्रिका के घटकों का वर्णन करना नहीं, बल्कि वे आवश्यक चरण प्रस्तुत करना है जिन्हें अपनाकर कोई शैक्षणिक या शोध संस्था अपनी पत्रिका को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और अनुक्रमण के स्तर तक पहुँचा सकती है। जिस भी शैक्षणिक या शोध संस्था की अपनी पत्रिका अभी नहीं है, उसे केवल इसकी आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए, बल्कि नीचे दिए मार्गदर्शिका के साथ इसकी शुरुआत भी करनी चाहिए।

शैक्षणिक शोध-पत्रिका की स्थापना एवं आवश्यक चरणों की मार्गदर्शिका

अपनाए जाने वाले चरण: यदि नीचे बताए गए प्रत्येक आवश्यक चरण का पालन किया जाए, तो एक कार्यशील, मान्यता-प्राप्त और अनुक्रमित शैक्षणिक पत्रिका की स्थापना और उसका संचालन बहुत सरल हो जाता है।
1. पत्रिका का नाम: हर शैक्षणिक पत्रिका की एक अलग पहचान होनी चाहिए, और वह पहचान उसके नाम से शुरू होती है। नाम ऐसा हो जो संस्था का परिचय तुरंत दे दे, स्पष्ट और गरिमामय हो, और बहुत लंबा न हो।
2. पत्रिका का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र: यदि आप बहु-विषयक पत्रिका शुरू नहीं कर रहे हैं, तो पत्रिका का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र ऐसा तय कीजिए जो उसे दूसरी पत्रिकाओं से अलग पहचान दे। यह उस क्षेत्र से जुड़ा हो जिसके लिए आपकी संस्था जानी जाती है। यदि आपकी संस्था किसी शैक्षणिक संस्थान का विभाग या संकाय है, तो उद्देश्य और कार्यक्षेत्र उसी विभाग या संकाय के विषयों से जुड़ा होना चाहिए। दोनों को पत्रिका के नाम के ठीक बाद स्पष्ट रूप से लिखा जाए। दूसरा विकल्प यह है कि आप सामान्य पत्रिका निकालें, जो बहु-विषयक हो, व्यापक दृष्टिकोण रखे और अनेक शोध-क्षेत्रों के योगदान स्वीकार करे।
3. संपादक मंडल का गठन: पत्रिका का एक प्रधान संपादक होना चाहिए। अधिकांश मामलों में यह पद मानद या औपचारिक होता है और संस्था के प्रमुख के लिए रखा जाता है। प्रधान संपादक के अतिरिक्त एक संपादक होना चाहिए, जो पत्रिका का मुख्य उत्तरदायी अधिकारी होगा और उसके संचालन में सबसे सक्रिय भूमिका निभाएगा। लगभग पाँच से सात अन्य शिक्षाविद, अधिमानतः संबंधित तथा सहायक विभागों के प्राध्यापक, संपादक मंडल के सदस्य बन सकते हैं, जो संपादक को पत्रिका चलाने में सहयोग देंगे। संस्थान/विश्वविद्यालय का कोई सहायक प्राध्यापक या (कम से कम स्नातकोत्तर उपाधि-धारी) एक अधिकारी इस मंडल का सचिव हो सकता है। इसके अलावा संस्था के भीतर और बाहर से लगभग पाँच से सात वरिष्ठ शिक्षाविदों को संपादकीय सलाहकार बनाया जाए, जो संपादक और संपादक मंडल को समय-समय पर सलाह और मार्गदर्शन देंगे। प्रस्तावित संपादक मंडल सदस्यों और सलाहकारों से औपचारिक रूप से संपर्क कर उनकी सहमति और सहयोग प्राप्त करना आवश्यक है।
4. प्रकाशन की आवृत्ति: यह तय किया जाना चाहिए की पत्रिका कितने अंतराल पर प्रकाशित होगी: मासिक, द्वैमासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, वार्षिक, या संपादक मंडल अथवा संस्था द्वारा निर्धारित कोई अन्य अवधि। यह भी निश्चित कीजिए कि पत्रिका खंड (वॉल्यूम), श्रृंखला (सीरीज़) या अंक (नंबर) के रूप में निकलेगी। इससे पत्रिका का संदर्भ देना सरल हो जाता है।
5. प्रकाशन का स्वरूप: पत्रिका केवल मुद्रित होगी, केवल ऑनलाइन होगी, या दोनों रूपों में? साथ ही यह भी निश्चित कीजिए कि वह सदस्यता-आधारित होगी, जिसमें पाठकों को सामग्री पढ़ने के लिए सदस्यता लेनी पड़े, या मुक्त-पहुँच (ओपन एक्सेस) होगी, जिसे कोई भी ऑनलाइन निःशुल्क पढ़ सके।
6. स्वीकृत शोध-पत्रों का प्रकाशन शुल्क: स्वीकृत शोध-पत्रों का प्रकाशन निःशुल्क होगा या उसके लिए निर्धारित आलेख प्रकाशन शुल्क लगेगा? यदि शुल्क है, तो लेखक को यह समीक्षा से पहले देना होगा या समीक्षा और स्वीकृति के बाद?
7. ISSN प्राप्त करना: संस्था के शैक्षणिक पुस्तकालयाध्यक्षों को मुद्रित और ऑनलाइन, दोनों संस्करणों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक क्रमिक संख्या (ISSN) प्राप्त करने में सहायता करनी चाहिए।
8. eISSN प्राप्त करना: eISSN आठ अंकों का एक विशिष्ट कोड है, जो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की पहचान कराता है। इससे विद्वानों और पुस्तकालयाध्यक्षों के लिए पत्रिका को खोजना और अनुक्रमित करना आसान हो जाता है, और पाठकों तथा अनुक्रमण संस्थाओं को यह संकेत भी मिलता है कि पत्रिका प्रामाणिक है।
9. डिजिटल ऑब्जेक्ट आइडेंटिफ़ायर (DOI) प्राप्त करना: DOI आपकी पत्रिका और उसके लेखों की स्थायी और विशिष्ट पहचान है, जिससे विद्वान और संस्थाएँ उन्हें आसानी से खोज और उद्धृत कर सकते हैं। वेब-लिंक समय के साथ बदल सकते हैं, पर DOI सदैव वही रहता है और पत्रिका का पूरा मेटाडेटा अपने साथ रखता है। DOI आधिकारिक पंजीकरण एजेंसी क्रॉसरेफ़ (Crossref, https://www.crossref.org/) के माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं। संदर्भ-उद्धरण में DOI तेज़ी से अनिवार्य होता जा रहा है। इसके दो भाग होते हैं: (i) उपसर्ग (प्रीफ़िक्स), जो DOI पंजीकरण एजेंसी द्वारा संस्था को दिया जाता है; (ii) प्रत्यय (सफ़िक्स), जिसे सामग्री जमा करने वाली संस्था स्वयं बनाती है।
10. पत्रिका का विशिष्ट आधिकारिक ईमेल पता: पत्रिका के लिए अलग ईमेल पता बनाना उचित है। यह किसी भी निःशुल्क वेब-आधारित ईमेल सेवा से बनाया जा सकता है। यदि आपकी संस्था की आधिकारिक वेबसाइट है, तो उसी के डोमेन पर ईमेल पता बनवाना बेहतर होगा, जिसमें संस्था का वेबमास्टर सहायता करे। सबसे अच्छी स्थिति तब होगी जब पत्रिका की अपनी अलग वेबसाइट हो और ईमेल पता उसी वेबसाइट के डोमेन पर हो।
11. पत्रिका के लिए वेबसाइट या वेब-स्थान की व्यवस्था: संस्था का आईसीटी विभाग या वेबमास्टर संस्था की वेबसाइट पर पत्रिका और स्वीकृत लेखों के लिए पृष्ठ बनाने में सहायता करे। यह संभव न हो तो ऐसी सेवा देने वाली अन्य संस्थाओं की वेबसाइट पर पृष्ठ बनवाए जा सकते हैं। जैसा ऊपर कहा गया, पत्रिका की अपनी स्वतंत्र वेबसाइट सर्वोत्तम है। पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर नाम, उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र, और संपादकों की जानकारी (उनके संबद्ध संस्थान सहित) होनी चाहिए। प्रत्येक खंड का एक पूर्ण पृष्ठ हो, और प्रत्येक स्वीकृत लेख अधिमानतः PDF रूप में अपने विशिष्ट URL के साथ प्रकाशित हो। आगे चलकर पत्रिका DOI के लिए आवेदन करेगी और प्रत्येक प्रकाशित लेख का अपना विशिष्ट DOI होगा।
12. पत्रिका के समीक्षक: संपादकों को संबंधित क्षेत्रों के शिक्षाविदों और विशेषज्ञों से संपर्क कर उन्हें प्रस्तुत लेखों के समीक्षक (रेफ़री) बनने के लिए आमंत्रित करना। यही लोग लेखों की जाँच, आलोचनात्मक परख और मूल्यांकन करते हैं, और सुनिश्चित करते हैं कि लेख प्रकाशन के मानकों पर खरा उतरता है या प्रकाशन से पहले उसमें सुधार की ज़रूरत है। पत्रिका की नीति और समीक्षकों से हुई सहमति के अनुसार यह सेवा सशुल्क या स्वैच्छिक हो सकती है।
13. शोध-पत्रों के लिए आमंत्रण (कॉल फ़ॉर पेपर्स): ऊपर के सभी या अधिकांश चरण पूरे हो जाने के बाद संपादक व्यक्तिगत संपर्कों, सोशल मीडिया और अन्य संबंधित संस्थाओं से संपर्क के माध्यम से विज्ञापन देकर शोध-पत्र आमंत्रित करेंगे।
14. प्राप्त शोध-पत्रों का संकलन: संपादक प्राप्त लेखों का संकलन करेंगे और पहली पढ़ाई में यह जाँचेंगे कि वे पत्रिका के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र के अनुरूप हैं या नहीं। यह कार्य लेख आने के साथ-साथ समय-समय पर होना चाहिए। यदि संपादक किसी विशेष तिथि तक अंक निकालना चाहते हैं, तो लेख जमा होने और प्रकाशन के बीच कम से कम दो माह का अंतर रखा जाए, ताकि संपादकों और समीक्षकों को आगे के चरण पूरे कर यह निर्णय लेने का पर्याप्त समय मिल सके कि कौन-से लेख प्रकाशित हो सकते हैं।
15. साहित्यिक चोरी (प्लेजियरिज़्म) की जाँच: शोध-पत्र वैज्ञानिक, मौलिक और मानक-अनुरूप हों, लेखकों में शोध-ईमानदारी की चेतना विकसित हो और स्वस्थ तथा निष्पक्ष शैक्षणिक वातावरण बने, इसके लिए उचित है कि प्रत्येक लेखक जमा करने से पहले स्वयं अपने पत्र की प्लेजियरिज़्म जाँच करे। इसके बाद संपादक भी हर प्राप्त पत्र की जाँच करेंगे, जिसके लिए वे संस्था के शैक्षणिक पुस्तकालयाध्यक्षों की सहायता ले सकते हैं। कोई भी पत्र समीक्षकों को तभी भेजा जाए जब उसमें समानता 15% (या संपादकों द्वारा तय इससे कम सीमा) से अधिक न हो। इससे अधिक समानता वाले पत्र को पुनर्लेखन और पुनः प्रस्तुति के लिए लेखक को लौटा दिया जाए।
16. गोपनीय (ब्लाइंड) सहकर्मी समीक्षा: प्लेजियरिज़्म जाँच में सफल पत्रों से लेखकों की पहचान या संबद्धता उजागर करने वाली हर जानकारी हटाकर उन्हें निष्पक्ष ब्लाइंड सहकर्मी समीक्षा के लिए कम से कम तीन समीक्षकों के पास भेजा जाएगा। समीक्षकों को अपनी समीक्षा की विस्तृत रिपोर्ट देनी होगी। संपादक एक प्रपत्र भी बना सकते हैं, जिसे समीक्षक समीक्षा के बाद भरें। ये रिपोर्टें और भरे हुए प्रपत्र संपादकों को आगे का निर्णय लेने में दिशा देंगे। प्रकाशन के लिए तीन में से कम से कम दो समीक्षकों की संस्तुति अनिवार्य है।
17. संपादकों द्वारा अंतिम समीक्षा: संपादक समीक्षकों की रिपोर्टों का अध्ययन करेंगे और प्रकाशित होने वाले पत्रों पर अंतिम निर्णय लेंगे। यदि कम से कम दो समीक्षक किसी लेख की संस्तुति नहीं करते, तो संपादकों को वह लेख अस्वीकार कर देना चाहिए। वे लेखक को अस्वीकृति का कारण बता सकते हैं, और जो लेख पत्रिका के उद्देश्य एवं कार्यक्षेत्र से बाहर है, उसके लिए अन्य उपयुक्त पत्रिकाएँ सुझा सकते हैं। लेखक को अवसर दिया जा सकता है कि वह समीक्षकों की रिपोर्ट और संपादकों के सुझावों के आधार पर लेख को दोबारा लिखकर अगले मूल्यांकन-चक्र के लिए पुनः प्रस्तुत करे।
18. शोध-पत्रों का प्रकाशन: लेखों की स्वीकृति के बाद (प्रकाशन समिति द्वारा), पत्रिका की अगली प्रकाशन-अवधि के अनुसार प्रकाशन किया जाए। किसी अंक में कितने लेख जाएँगे, यह संपादक तय कर सकते हैं। यदि प्रकाशन की निर्धारित अवधि पर कोई स्वीकृत लेख तैयार न हो, तो उस अवधि का अंक निकालना अनिवार्य नहीं है।
19. प्रकाशन समिति: प्रकाशन समिति का गठन संस्थान के प्रमुख/निदेशक या विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा किया जाएगा। एक कार्यशील कार्यालय की स्थापना, जिसमें कार्यकारी संपादक, कंप्यूटर ऑपरेटर और कार्यालय सहायक जैसे आवश्यक कर्मचारी हों।
20. प्रकाशन समिति की भूमिका: यह अत्यंत आवश्यक है कि प्रकाशित हर शोध ईमानदारी और मौलिकता के अपेक्षित मानकों पर खरा उतरे। इसलिए प्रकाशन समिति की भूमिकाओं में ये बातें शामिल होंगी: शोधार्थियों/विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत शोध-प्रबंधों और लघु-शोध-प्रबंधों की प्लेजियरिज़्म रिपोर्ट का अध्ययन करना; पीएच.डी. शोध-प्रबंध में समानता 10% और स्नातकोत्तर लघु-शोध-प्रबंध में 15% से अधिक न होने देना; इससे अधिक समानता वाली प्रस्तुतियों पर प्लेजियरिज़्म नीति के अनुसार कार्रवाई करना; और यह सुनिश्चित करना कि शिक्षकों की पदोन्नति के लिए निर्धारित नियामक मानदंड, अर्थात् विशिष्ट अनुक्रमण डेटाबेस में न्यूनतम प्रकाशन, पूरे हों। शिक्षकों की पदोन्नति-पात्रता को प्रकाशन-अपेक्षाओं के संदर्भ में प्रमाणित करने का दायित्व भी समिति का है। कोई भी शिक्षक या विद्यार्थी, जिसे लेख प्रकाशित कराने में सहायता चाहिए, पांडुलिपि की स्वीकृति के बाद पत्रिकाओं के सुझाव के लिए समिति से संपर्क कर सकता है। समिति लिखित कार्य को बेहतर बनाने के सुझाव भी दे सकती है।
21. अनुक्रमण के लिए आवेदन: पहला खंड प्रकाशित होने के बाद (या एक वर्ष पूरा होने पर) संपादकों को वेब ऑफ़ साइंस, पबमेड, स्कोपस, गूगल स्कॉलर तथा अन्य अनुक्रमण संस्थाओं में पत्रिका के पंजीकरण के लिए आवेदन करना चाहिए, ताकि पत्रिका को व्यापक पहुँच और मान्यता मिल सके।
22. ज्ञान-भंडार में योगदान: यह आलेख शोधकर्ताओं को बताता है कि शैक्षणिक पत्रिका क्या होती है और क्या नहीं। साथ ही यह एक कार्यशील, मान्यता-प्राप्त और अनुक्रमित शैक्षणिक पत्रिका बनाने और चलाने के आवश्यक चरण बताता है। इस प्रकार ऐसी पत्रिका की आकांक्षा रखने वाली शैक्षणिक या शोध संस्था के लिए इन चरणों का पालन करते हुए यह लक्ष्य पाना अधिक सुगम हो सकता है।

प्रमोद कुमार, शिक्षाविद

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