हेलमेट से चप्पल तक और प्रोटेस्ट से पत्नी के विरोध तक, जानिए आंदोलनों की मजेदार दुनिया!
जीवन, स्वतंत्रता और हमारे ‘आंदोलन’
आजकल समाचारों में बस ‘प्रदर्शन और आंदोलन’ की ही खबरें छाई हुई हैं—उत्तर में प्रदर्शन, दक्षिण में आंदोलन, पूर्व में हड़ताल और पश्चिम में चक्का जाम! अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन भी हैं और राष्ट्रीय भी; लेकिन इन सबसे परे, एक ऐसा आंदोलन भी है जो दुनिया के हर इंसान की ज़िंदगी में होता है—चाहे उसका धर्म, जाति, लिंग, वर्ग या प्रजाति कोई भी हो। इसे कहते हैं: ‘घरेलू आंदोलन’ !
अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन बड़े व्यापक और वैश्विक किस्म के होते हैं क्योंकि ये इस ग्रह के हर प्राणी को प्रभावित करते हैं। ऐसा ही एक सबसे खूंखार आंदोलन वह है, जिसमें महिलाओं ने पूरे ‘कलर फैमिली’ को सिर्फ 7 तय रंगों (VIBGYOR) में सीमित करने के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इसकी गंभीरता का अंदाज़ा आप किसी भी घर में जाकर लगा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) का ‘रंग विभाग’ (जो कि विशुद्ध पुरुषों का क्लब है), ‘कलरफुल विमेंस सोसाइटी’ के मुकदमों से बचने के लिए नौकरशाही के दांव-पेच लगाकर फैसला सुनाने की तारीखें आगे बढ़ा रहा है।
जब संयुक्त राष्ट्र रंगों के इस बवाल से निपटने में व्यस्त है, तब हमारे ‘राष्ट्रीय आंदोलन’ हमारी राष्ट्रीय पहचान की तरह ही पूरी तरह से हर रूप से हमारे खून में बह रहे हैं। राष्ट्रीय आंदोलन क्या हैं? यह राष्ट्रीयता से जुड़े वे मुद्दे हैं, जो केवल देशवासियों को महत्वपूर्ण लगते हैं। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है—”बिना हेलमेट दोपहिया वाहन चलाने का आंदोलन!” क्योंकि हेलमेट की अपनी कुछ दुष्ट विशेषताएं हैं: यह आपकी हेयरस्टाइल का कबाड़ा करता है, मेकअप कम करता है और (गलती से) जान बचा लेता है!
‘पारले-जी’ (Parle-G) को भारत का ‘राष्ट्रीय बिस्कुट’ घोषित कराने के लिए चले एक सफल राष्ट्रीय आंदोलन के बाद, मुझे अपने ही घर में एक भयंकर ‘चप्पल-मार घरेलू आंदोलन’ का सामना करना पड़ा उसका प्रमुख कारण राष्ट्रीय आंदोलन में अत्यधिक व्यस्त रहने के कारण सब्जी खरीदते वक्त हुई ‘सिलेक्टिव मेमोरी लॉस’ ( भूलने की बीमारी) था। जिसका परिणाम: सोफे पर खाली पेट बिताई गई खौफनाक रात। इससे हमे जीवन का एक महत्वपुराण पाठ सीखने को मिलता है की घरेलू आंदोलन किसी भी विश्व-कल्याणकारी आंदोलन से कई गुना ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं और स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हो सकते हैं।
आंदोलनों का तुलनात्मक रिपोर्ट कार्ड : अंतर्राश्यरिया आंदोलन का परिणाम “ अंतरराष्ट्रीय ख्याति, सोशल मीडिया फॉलोअर्स, वविदेशी अवॉर्ड्स और बैंक मे मोटा पैसा। उसकी लोकेशंस अत्यंत सुंदर और खूबसूरत होती है और प्रदर्शन कराइयों को माहौलकी हिसाब से फैशनेबल और स्टाइलिश कपड़े मिलते हैं।
राष्ट्रीय आंदोलन की दो पहेलू होते हैं, या तो रातों रात प्रसिद्धि या रात मे ही जेल। फैशन की मामले मे देसी कपड़े ही पहने पड़ते है, और लोकेशन की नाम पर कोई भी मोहल्ला हो सकता है और पुलिस की डंडे भी मुफ्त मे मिल सकते हैं।
घरेलू आंदोलन की सबसे बड़ी ख़ासियत या ताक़त है इसका लचीलापन और जैविक स्वभाव, इसे कभी भी कोई भी किसी भी कपड़े मे किया जा सकता है पर इसका परिणाम सबसे खटतरनाक होता है.
घरेलू आंदोलन के बाद का माहौल इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितने कुशल मध्यस्थ (negotiator) हैं—रात शांति में बीतेगी या ‘एक्शन’ में! इसके परिणाम और समय सीमाएं अलग-अलग हो सकती हैं—महीने, दिन, घंटे या मिनट।
दुनिया के सबसे छोटे आंदोलन (5 सेकंड) का विश्व रिकॉर्ड एक छोटे बच्चे के नाम है, जिसने दूध के लिए रोकर विरोध जताया था। वहीं सबसे लंबे आंदोलन (आजीवन) का रिकॉर्ड मंगल ग्रह के एक जोड़े के पास है, जिनकी बहस का मुद्दा है—”आज रात खाने में क्या बनेगा?”
घरेलू आंदोलनों किस प्रकार का है यह प्रदर्शनकारी की प्रकृति के आधार पर किया जाता है:पत्नी का आंदोलन: नए कपड़ों के लिए।बच्चे का आंदोलन: नए खिलौनों के लिए,पति का आंदोलन: गर्म खाने के लिए,बॉस का आंदोलन: काम के लिए,कर्मचारी का आंदोलन: छुट्टी के लिए!
ज्ञान बढ़ाने की अपनी तीव्र इच्छा के कारण जब मैंने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी खंगाली, तो पता चला कि ‘Protest’ की परिभाषा है: किसी विचार, नीति या सत्ता के प्रति असहमति या विरोध का मुखर प्रकटीकरण।
लेकिन आगे की रिसर्च में एक छुपा हुआ राज़ खुला—यह शब्द टीवी न्यूज़ चैनलों की बहसों में आने से पहले एक कानूनी शब्द था। तब इसका मतलब किसी का विरोध करना नहीं, बल्कि “पवित्रता से सत्य की घोषणा करना या कसम खाना” था। कुछ राजनीतिक समूह इसका नाता 1529 के ‘प्रोटेस्टेंट’ (Protestant) आंदोलन से जोड़ते हैं, लेकिन गुप्त आंदोलनकारियों की समिति जिसका कोई अस्तित्व नहीं है ने इसे खारिज कर दिया और ‘आंदोलन’ को एक ‘ओपन-सोर्स’ और बिल्कुल मुफ्त प्लेटफॉर्म घोषित कर दिया।
17वीं शताब्दी के मध्य तक इस शब्द का अर्थ “सत्य की पुष्टि” से बदलकर “किसी नीति या कार्रवाई का विरोध” होने लगा। 18वीं शताब्दी के अंत में (अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांतियों के दौरान) इसे सार्वजनिक विरोध का आधुनिक रूप मिला।
अब आप समाघ सकते हैं कि फ्रांसीसियों और अमेरिकियों को आंदोलनों से इतना प्यार क्यों है!
अंग्रेजी के ज्यादातर शब्दों की तरह, यह भी लैटिन शब्द protestari से आया है:Pro-: यानी “आगे”, “सामने” या “सार्वजनिक रूप से”।Testari: यानी “साक्ष्य देना” या “गवाही देना” (testis यानी गवाह से)।शाब्दिक अर्थ: “सार्वजनिक रूप से घोषणा करना या गवाही देना।”
लेकिन आधुनिक अंग्रेजी में Pro का मतलब होता है—कोई पेशेवर या एक्सपर्ट व्यक्ति। और Test का मतलब होता है—ज्ञान या क्षमता को मापने वाली परीक्षा!
तो जब मैंने इसमें जोड़, घटाव, गुणा और भाग लगाया, तो ‘Protest’ का असली अर्थ निकलकर सामने आया:
Pro-Test: किसी एक्सपर्ट द्वारा प्रश्नों के जरिए आपके ज्ञान या प्रदर्शन को मापने की विशिष्ट गतिविधि!
इसलिए, ‘Protest’ कोई क्रिया (verb) नहीं है, बल्कि वह इंसान है जिसका मुख्य काम आपके ज्ञान की परीक्षा लेना है! और मेरी इस मान्यता के हिसाब से, जो शख्स इस परिभाषा के सबसे करीब बैठता है, वह हैं मेरी ‘प्यारी मम्मी’ और मेरी ‘कार्मिक पार्टनर’ मेरी पत्नी!
आंदोलनों पर घंटों रिसर्च करने के बाद, मेरी उंगलियों के अत्यधिक शोषण के विरोध में मेरी आंखों और दिमाग ने अंदर से हड़ताल शुरू कर दी है। गर्दन ने कंधों के साथ हाथ मिला लिया है ताकि शरीर को दर्द देने का कार्य पूरा किया जा सके।
केवल कमर और टांगें ही मेरा समर्थन कर रही हैं, क्योंकि उन्हें गद्देदार कुर्सी की ‘रिश्वत’ मिली हुई है! हालांकि, उनकी दृश्य शक्ति की कमी को देखते हुए, दिमाग द्वारा इस जंग में पूर्ण विजय प्राप्त करने की संभावना काफी अधिक है।
इसलिए, इससे पहले कि शरीर का यह आंदोलन और उग्र हो जाए और मेरे खिलाफ कोई ‘सख्त कदम’ उठा लिया जाए, इस रिसर्च को यहीं रोक देना ही एकमात्र दर्दरहित और समझदारी भरा रास्ता है।
आप सभी को ‘अंतर्राष्ट्रीय घरेलू आंदोलन दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं!
✒️ अभिषेक तंवर
