सम्पादकीय

दीपावली केवल उत्सव नहीं, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- हमारी सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी का पर्व

दीपावली

ज्योति पर्व दीपावली हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा है । हमारी संस्कृति और परंपरा से जुड़ी हुई सदियों पुरानी आस्था है हमारी । सदियों से यह हमारी सामाजिक जीवन का

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

हिस्सा रही है । हम यहाँ आज यह बात बिल्कुल भी नहीं करेंगे कि हम दीपावली क्यों मनाते हैं । सभी को मालूम है इसलिए दुहराने की ज़रूरत नहीं है । पर हाँ ! हमारी आस्था और विस्वास के साथ कोई तर्क वितर्क नहीं । आज के दिन हम अपने घरों में दिए जलाते हैं । कहते हैं , अमावस्या की रात है और हम अपने आसपास के अँधेरे को दूर करने की कोशिश करते हैं । पर , यहाँ केवल बाहरी अंधेरे को मिटाने की बात नहीं है , बल्कि , कहीं न कहीं यह हमारे भीतर के अंधेरे को भी दूर करने का संदेश देती है । हालाँकि ये पंक्ति प्रतीकात्मक है , पर अपने अंदर एक गुढ फ़िलासफ़ी को समेटे हुए है । बहुत सारी बातें इसके साथ जुड़ी हुई हैं । कहीं ना कहीं हमारी अर्थव्यवस्था भी । इसी बहाने हम समाज के सभी घटकों को छूने की कोशिश करते हैं । हमारे पूर्वजों ने यूँ ही किसी चीज़ को स्वीकार नहीं कर लिया था । वर्षों तक चले प्रयोग के बाद, तर्क की कसौटी पर पूरी तरह कसने के बाद ही किसी चीज़ को अपनाया जाता था । जब एक बार हमने अपना लिया, अपने सामाजिक जीवन में इसका समावेश कर लिया तो फिर पीछे मुड़कर देखने की बात नहीं । अब तो यह सिर्फ और सिर्फ एक रस्म न होकर हमारे लिए हमारी सामूहिक चेतन और सांस्कृतिक पहचान का एक अहम हिस्सा हो गई है । आज के दिन दीपोत्सव के बाद आतिशबाज़ियाँ होती हैं । हालाँकि दीपोत्सव हम बहुत पहले से मनाते आ रहे हैं । आतिशबाज़ी तो बहुत बाद की बात है । हम ख़ुशियाँ मनाते हैं और ख़ुशियों को मनाने का एक तरीक़ा है आतिशबाज़ी । बहुत सारे देशों में ख़ास मौकों पर आतिशबाज़ियाँ होती हैं । सार्वजनिक और सरकारी तौर पर होती हैं । ऐसा माना जाता है कि आतिशबाज़ी की शुरुआत लगभग नवीं शताब्दी में चीन से हुई थी । हालाँकि वहाँ के लोग 2000 साल पहले से ही बाँस के खोखले टुकड़े को आग में डालते थे । गर्म होने पर बाँस तेज आवाज़ के साथ फटता था । इसे वहाँ के लोग बुरी आत्माओं को भगाने और शुभ अवसरों पर इस्तेमाल करते थे । लगभग तेरहवीं शताब्दी के दौरान मध्य एशिया से होते हुए चौदहवीं शताब्दी में यह युरोपीय देशों में पहुँचा । भारत में आतिशबाज़ी की शुरुआत मध्य काल में हुई थी । अब तो आतिशबाज़ी ,किसी ख़ास दिन तक सीमित ना होकर हर तरह के शुभ अवसर पर की जाती है । पर, एक बात हर साल दीपावली के आने से पहले एक बहस सी छिड़ जाती है । दीपावली और प्रदूषण । भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक बात पहुँचती है । उनके लिए एक कठिन परिस्थिति होती है । लोगों की भावनाओं एवं यहाँ की सांस्कृतिक विरासत और परंपरा को एक साथ रखकर निर्णय लेने की । इन दोनों के बीच संतुलन बनाय रखना निश्चित तौर पर आसान नहीं। बात थोड़ी बहुत ख़त्म होती है हरित पटाखों के इस्तेमाल पर जाकर । हालाँकि हम सभी जानते हैं सच्चाई को । दीपावली और प्रदूषण लोगों ने इसे पर्याय मान लिया है । क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ आतिशबाज़ी ही प्रदूषण का कारण है ? शायद हम सभी के लिए यह एक यक्ष प्रश्न है । क्या हम साल के बाकी दिनों में होनेवाले प्रदूषण के स्रोतों और उसमे अपनी भूमिका पर उतनी ही गंभीरता से विचार करते हैं । ये सारे सवाल अपनी अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं । इसका हल भी हम सभी जानते हैं । फिर भी हमारी सामूहिक चेतन हमेशा ही उतनी मुखर क्यों नहीं होती जितना दीपावली के आसपास हो जाती है ?
पर्यावरण , किसी एक दिन , एक पर्व या फिर एक मौसम का विषय नहीं होना चाहिए । यह हमारे जीवन का आधार है । इसकी रक्षा भी किसी एक दिन की रस्म नहीं , बल्कि हमारे रोजमर्रा की जीवनशैली का हिस्सा होना चाहिए ।
दीपावली पर केवल घरों को मत सजाइए,
किसी उदास चेहरे पर मुस्कान भी लाइए।
दीप तो जलते रहेंगे हर साल की तरह,
इस बार किसी के जीवन में उजाला बन जाइए।
आप सभी को प्रेम, प्रकाश और सद्भाव से परिपूर्ण दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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