सम्पादकीय

समाजवाद की बात, व्यवहार में भेदभाव, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- ‘हाउस हेल्प’ और ‘रेजिडेंट’ के बीच खड़ी अदृश्य दीवार

बराबरी ग्राउंड फ्लोर पर ही रह गई

अपार्टमेंट में अमुमन दो लिफ्ट हुआ करता है । अगर अपार्टमेंट थोड़ा ज़्यादा बड़ा हुआ तो चार भी हो सकता है, पर एक बात तो सभी अपार्टमेंट में एक जैसा ही होता है वो है एक लिफ्ट अपार्टमेंट

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

में रहने वाले या फिर उनके अतिथियों के लिए सुरक्षित किया जाना तथा दूसरे लिफ्ट का आपके घरों में काम करने वाले लोगों के लिए जिसे हम थोड़ा आदर सम्मान देते हुए ‘ हाउस हेल्प ‘ कहते हैं उनके लिए सुरक्षित किया जाना । हम फ्लैट में रहने वाले तो इन नियमों को तोड़ सकते हैं, उसका अतिक्रमण कर सकते हैं, पर यह अधिकार हमने उन्हें नहीं दिया है । विडंबना तो यह है कि ऐसे नियमों को विनियमित ( regulate) करने की ज़िम्मेदारी भी हमने उसी तबके पर डाल रखी है और वो बेचारा बड़ी ही शिद्दत से ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाता है । भगवान उन्हें माफ़ करें । वो बेचारे नादान हैं । वो नहीं जानते कि वो क्या कर रहे हैं । वैसे अगर जान भी जाएं तो क्या विकल्प है उनके पास । रोटी दाल की समस्या से परे तो नहीं है वो ।
बातें करने के लिए तो हम सभी समाजवाद के झंडाबरदार हो जाते हैं, पर व्यवहार में कोसों दूर । समय और परिस्थिति के अनुसार हमारी परिभाषा बदलती रहती है, पर एक बात है- सोच हमारी नहीं बदलती ।
हम दरअसल वी आई पी सिंड्रोम से पीड़ित होते हैं । हम जो नहीं होते हैं हम वो दिखाना चाहते हैं । हम ना तो उसके लायक होते हैं और ना ही हम गजकेसरी योग में जन्म लिए होतें हैं कि हमें एक प्लेट में सजा कर वो सभी चीज़ें दी जाए जिसके हम हकदार नहीं हैं । बहुत छोटी छोटी चीज़ों पर हमारी सोच निकल कर सामने आ जाती है । समाजवाद तो कहाँ पीछे छूट जाता है, पता ही नहीं चलता । मामला वाश रूम इस्तेमाल करने का हो या फिर मंदिर में पंक्तिबद्ध होने का हो, हमारी सोच कभी नहीं बदलती ।
खैर ! कभी-कभी ऐसे मौक़े भी आएं हैं जब मुझे उस तथाकथित दूसरे लिफ्ट से सफ़र करने का मौक़ा मिला है । सफ़र करने के दौरान इस बात का पता बख़ूबी चल जाता है कि इस लिफ्ट से मुझसे पहले किसने सफ़र किया है । कभी विम बार की ख़ुशबू आती है तो कभी अगर कोई कामगार किसी के यहाँ से खाना बनाकर निकला है तो फिर मसाले की ख़ुशबू । बस आपकी घ्राण शक्ति उस स्तर की होनी चाहिए ।
यहाँ पर हम एक बात का ज़िक्र करना चाहेंगे- मुंबई के लोकल ट्रेन में अगर आपने सफ़र किया हो तो आप मेरी इस बात से ज़रूर सहमत होंगे । सामान्य डब्बा हो या फिर फर्स्ट क्लास का डब्बा, पीक आवर में भीड़ दोनों में होती है । अंतर बस इतना सा होता है- सामान्य डब्बे में पसीने की ख़ुशबू आती है और फर्स्ट क्लास के डब्बे में इत्र, परफ़्यूम और डियो की ख़ुशबू आती है । कहीं ना कहीं यही बात अपार्टमेंट के लिफ्ट पर भी लागू होता है ।
आप कुछ नहीं करना है बस अपनी सोच को उस स्तर पर , स्वयं सिद्धता के स्तर पर ले जाएं जहाँ यह सब बातें आपको बेमानी लगेंगीं । पर मेरे लिए भी शायद यह व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं । हमें लगता है कि हमारे बदल जाने से क्या सभी बदल जाएँगे । बस इसी सोच और मानसिकता के साथ हम सभी तालाब में दूध की जगह पानी डालते चलते हैं ।

डिस्क्लेमर: “दिल पर मत लें भाई”

मनीष वर्मा “मनु”

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