सम्पादकीय

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ऋतु परिवर्तन का लोकउत्सव: लोहड़ी और नई ऋतु की दस्तक

डॉ. प्रियंका सौरभ भारत की लोकपरंपराएँ केवल पर्व-त्योहार नहीं होतीं, वे समाज की सामूहिक स्मृति, प्रकृति-बोध और जीवन-दर्शन की जीवित

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मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

डॉ. सत्यवान सौरभ मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामाजिक सहभागिता और

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हीटर, ठंड और मजबूरी, “रविवारीय में आज पढ़िए – हर सुबह दफ़्तर तक पहुँचने की कहानी

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘ स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा उफ़्फ़ ये ठंडी और दफ़्तर! रात

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विश्वविद्यालय, सत्ता और साहित्य की अपमानित गरिमा

डॉ. प्रियंका सौरभ गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार मनोज

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स्वामी विवेकानंद का ‘विश्वगुरु भारत’ : खंडित विश्व के लिए वेदांत की प्रासंगिकता

(जहाँ से विश्व को दिशा मिले : विवेकानंद और विश्वगुरु भारत की संकल्पना) डॉ. सत्यवान सौरभ इक्कीसवीं सदी का विश्व

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वेनेजुएला संकट के बहाने वैश्विक शक्ति-संतुलन

डॉ. सत्यवान सौरभ हाल ही में वेनेजुएला में घटित राजनीतिक घटनाक्रम और उसमें अमेरिकी हस्तक्षेप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक

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युवा एमपी-एमएलए, जो भारतीय युवाओं के लिए बने राजनीतिक प्रेरणा: डॉ. अतुल मलिकराम

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसके निरंतर नवीन बने रहने की क्षमता में है। हर चुनाव के साथ नई

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क्लाइमेट चेंज का चुनावी मुद्दा ‘ग्रीन राजनीति की रणनीति’ – डॉ. अतुल मलिकराम 

भारतीय राजनीति में चुनावी मुद्दे समय के साथ बदलते रहे हैं। कभी विकास, कभी महंगाई, कभी रोजगार तो कभी सुरक्षा

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समय चुराकर मनाया गया नववर्ष, रविवारीय” में आज पढ़िए- भीड़, चाय और थोड़ी-सी ख़ुशी

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘ स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा सभी को यह सौभाग्य कहाँ मिलता है

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