युद्ध-विरोध की सांस्कृतिक हुंकार: ‘रश्मिरथी’ के मंचन ने जगाई शांति की चेतना
छपरा। भारतीय जनमानट्य संघ (इप्टा), छपरा द्वारा ब्रज किशोर किंडर गार्टन परिसर में रविवार को आयोजित इप्टा, छपरा के 29 सम्मेलन सह लोक रंग उत्सव 2026 का सांस्कृतिक सत्र कला और विचार की ऐसी संगति बनकर उभरा, जिसमें युद्ध-विरोध, शांति और मानवीय मूल्यों की स्पष्ट और प्रखर अभिव्यक्ति दिखाई दी। कार्यक्रम का केंद्रबिंदु रहा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ का नाट्य मंचन, जिसने समकालीन वैश्विक युद्ध-संकटों के बीच शांति के पक्ष में सशक्त हस्तक्षेप किया।
नाट्य प्रस्तुति: विचार और भाव का सशक्त संगम
‘रश्मिरथी’ के इस मंचन में कर्ण और कृष्ण के संवादों के माध्यम से धर्म, नीति और सत्ता के द्वंद्व को आज के संदर्भों में पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की गई। मनोरंजन पाठक का कर्ण जहां आत्मसम्मान और करुणा का प्रतीक बनकर उभरा। कर्ण के रूप में मनोरंजन पाठक ने नाटक की आत्मा को जीवंत कर दिया। उनका अभिनय केवल संवाद-अभिनय नहीं, बल्कि भाव-स्थितियों की गहरी यात्रा था—अपमान, दानवीरता, आत्मगौरव और अंतर्द्वंद्व का संगम।
वहीं डॉ० अमित रंजन का कृष्ण विवेक और रणनीतिक नैतिकता के प्रतिनिधि के रूप में प्रभावशाली रहे। कृष्ण के रूप में डॉ० अमित रंजन ने बुद्धि, कूटनीति और करुणा के त्रिकोण को संतुलित रूप में मंच पर उतारा। उनका कृष्ण केवल ‘लीलाधर’ नहीं, बल्कि एक ऐसे चिंतक का रूप लेता है जो युद्ध की अनिवार्यता और शांति की आकांक्षा—दोनों के बीच संवाद स्थापित करता है।
कंचन बाला की कुंती ने मातृत्व और अपराधबोध की जटिल भावभूमि को संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया, जबकि शैलेन्द्र शाही (इन्द्र), पंकज कुमार (दुर्योधन) सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी (कृपाचार्य) ने सत्ता के द्वंद्व को जीवंत किया।
परशुराम के रूप में बबुआनन्द द्विवेदी ने गुरु-शिष्य संबंध की त्रासदी को प्रभावी ढंग से उभारा।
अर्जुन के किरदार में विजय शंकर ने संयमित और गरिमापूर्ण अभिनय किया।भीम के रूप में अमितेश ने शारीरिकता और आक्रामकता के तत्वों को प्रभावी ढंग से साधा।
निर्देशन, नाट्यांतरण और रंग-परिकल्पना डॉ० अमित रंजन की रही, जिसमें पारंपरिक और आधुनिक रंगभाषा का संतुलित प्रयोग दिखा। संगीत संयोजन कंचन बाला और टुन्नू तनहा का रहा, जिसमें पूर्व-रिकॉर्डेड ट्रैक के साथ मंचीय गतियों का तालमेल उल्लेखनीय रहा।
कोरस और मंच-संरचना:
सामूहिकता की ताकत
कोरस कलाकारों—शालनी कुमारी, प्रिया और प्रियंका श्रीवास्तव, मोहित श्रीवास्तव व जितेन्द्र कुमार—ने नाटक को गति और विस्तार दिया। समूह-गायन और सामूहिक गतियों ने कथानक को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान किया।
अभिलाषा कुमारी (समय) और आयुषी परासर (नटी) जैसे प्रतीकात्मक पात्रों का प्रयोग नाटक को दार्शनिक गहराई देता है, जो इप्टा की परंपरा के अनुरूप है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: लोक से जन तक
नाट्य मंचन से पूर्व सांस्कृतिक सत्र का उद्घाटन वरिष्ठ रंगकर्मी पशुपति नाथ अरुण और जिला विधिज्ञ संघ के अध्यक्ष रविरंजन प्रसाद सिंह ने दीप प्रज्वलित कर किया।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रसिद्ध गायक रामेश्वर गोप के कबीर गायन से हुई, जिसने ‘साखी’ और ‘सबद’ के जरिए आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना का वातावरण बनाया।
इसके बाद कंचन बाला और साथियों ने इप्टा गीतों और जनगीतों की प्रस्तुति से जनांदोलन की परंपरा को मंच पर जीवंत किया। समृद्धि श्रेया का सूफी गीत ‘छाप तिलक’ भावपूर्ण रहा, जबकि प्रिया, प्रियंका और मोहित की ‘दमादम मस्त कलंदर’ प्रस्तुति ने उत्साह का संचार किया। साक्षी प्रिया, समृद्धि श्रेया और प्रियंका कुमारी ने उत्कृष्ट लोकगीतों की प्रस्तुति से दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
लोकगीतों, ग़ज़ल, फिल्मी गीत और आयुषी परासर द्वारा नृत्य की विविध प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को बहुरंगी बना दिया। विनय विशेष रूप से विनय कुमार की ग़ज़ल, जितेन्द्र कुमार राम की सुगम गीत और कंचन बाला की चैती ने स्थानीय लोकधारा को सजीव
समीक्षात्मक दृष्टि: प्रभाव और सीमाएं
यह आयोजन स्पष्ट रूप से इप्टा की वैचारिक परंपरा—“कला जन के लिए”—को आगे बढ़ाता है। ‘रश्मिरथी’ जैसे महाकाव्य का चयन और उसका युद्ध-विरोधी पुनर्पाठ आज के समय में बेहद प्रासंगिक है।
हालांकि, मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में और विस्तार की गुंजाइश थी, जिससे नाटकीय प्रभाव और सघन हो सकता था। साथ ही, कुछ संवादों की गति और ध्वनि-संतुलन पर और काम किया जा सकता है।
समापन: सम्मान और संदेश
कार्यक्रम का संचालन
आकाशवाणी पटना की पूर्व उद्घोषिका कंचन बाला ने सहजता से किया। अंत में सभी कलाकारों को नवनिर्वाचित संरक्षक प्रो० लाल बाबू यादव, डॉ० नेहा पाण्डेय, वरिष्ठ कार्यकारिणी सदस्य डॉ० अंजलि सिंह द्वारा प्रतीक-चिह्न और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
लोक रंग उत्सव 2026 का यह सत्र सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि युद्ध के खिलाफ शांति, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की एक सशक्त सांस्कृतिक घोषणा बनकर उभरा।
