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छपरा की शाम में शेर नहीं, स्वाभिमान गूंजा: समीर परिमल की शायरी ने रचा सामूहिक गर्व का क्षण

छपरा, 21 जनवरी 2026: हथुआ मार्केट में देर शाम सजी अदब की महफ़िल किसी औपचारिक कवि सम्मेलन तक सीमित नहीं रही। यह वह शाम थी जब कविता ने अपने समय से सीधा संवाद किया और शेरों ने जनमानस की सुप्त चेतना को स्वर दिया। मुशायरे के केंद्र में रहे डिप्टी टैक्स कमिश्नर बिहार एवं प्रख्यात शायर समीर परिमल, जिनकी शायरी ने महफ़िल को तालियों के साथ-साथ आत्मगौरव की ऊर्जा से भर दिया।
जब समीर परिमल ने पढ़ा—

इश्क़ वाले हैं, प्यार वाले हैं
हम खिजां में बहार वाले हैं
मुस्कुरा कर जो देखिए हमको
जान दे दें, बिहार वाले हैं”

तो यह शेर महज़ रूमानी अभिव्यक्ति नहीं रह गया। इसमें मुस्कान के पीछे छिपे संघर्ष, सहनशीलता और स्वाभिमान की स्पष्ट झलक थी। यह पंक्तियाँ बिहार को पिछड़ेपन के चश्मे से देखने वाली दृष्टि पर करारा प्रहार थीं और यह संदेश दे रही थीं कि अभावों की खिजां में भी इस धरती ने प्रेम, संस्कृति और रचनात्मकता की बहार को जीवित रखा है।
समीर परिमल की शायरी की विशेषता यह रही कि उसमें फकीरी भी थी और फ़ख़्र भी। जब उन्होंने कहा—

कमतर न समझ लेना परिमल की फकीरी को,
इक वोट के दम पर हम सरकार बदलते हैं”

तो शेर लोकतंत्र की असली ताक़त का प्रतीक बन गया। यह फकीरी लाचारी नहीं, बल्कि जनशक्ति से उपजा आत्मविश्वास थी, जिसने श्रोताओं को सत्ता और नागरिक जिम्मेदारी का अर्थ याद दिलाया।
मुशायरे में युवा कवि अस्तित्व अंकुर ने अपनी संवेदनशील और तीखी नज़्मों से श्रोताओं को गहराई से सोचने पर मजबूर किया। उनकी पंक्तियाँ—

जबां सच बात कहने से मुकर जाए तो मर जाना,
कमी किरदार में अपने नज़र आए तो मर जाना

ने ज़ोरदार प्रभाव छोड़ा। वहीं—

यहाँ से होके तरक़्क़ी गुज़रने वाली है,
वो रास्ते में जो इक पेड़ था, कटा कि नहीं”

जैसे शेरों ने सामाजिक सरोकारों को मुखर किया।
कवि आशुतोष द्विवेदी की भावनात्मक पंक्तियाँ—

याद बहुत आती है मुझको,
छोड़ के जाने वाली लड़की”

ने महफ़िल को कुछ पल के लिए आत्मीय स्मृतियों में डुबो दिया।
डॉ. अमित रंजन की शायरी ने रुमान और विरह का संतुलन रचा।

हिचकियां आईं तो मैंने उठकर पानी पी लिया,
अब किसी के याद करने का भरम छोड़ दिया”

और

मेरी आँखों में तुम नहीं, नमी है,
वजह तुम नहीं, तुम्हारी कमी है”

पर श्रोताओं ने दिल खोलकर दाद दी।
इस अदबी शाम का अवसर बना प्रसिद्ध व्यवसायी, समाजसेवी एवं शायर सैयद कैसर हसन ‘बबलू राही’ के नए प्रतिष्ठान ‘तंजेब कुर्ता महल’ का उद्घाटन। कार्यक्रम के दौरान डिप्टी टैक्स कमिश्नर समीर परिमल ने प्रतिष्ठान का विधिवत उद्घाटन किया।
कवि सम्मेलन और मुशायरे की अध्यक्षता दक्ष निरंजन शंभु ने की। इस दौरान हंसमुख, कविन्द्र कुमार सहित अन्य रचनाकारों ने भी अपने कलाम प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का सधा हुआ और प्रभावशाली संचालन सुहैल अहमद हाशमी ने किया। इस अवसर पर शहर के गणमान्य नागरिक, साहित्यप्रेमी और बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद रहे।
पूरी महफ़िल का मिज़ाज इस बात का साक्ष्य बना कि यह आयोजन केवल साहित्यिक मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदना, अस्मिता और लोकतांत्रिक चेतना का सार्वजनिक संवाद था। यहाँ शेरों ने आईना दिखाया, दाद ने समर्थन दिया और श्रोताओं ने कविता में खुद को पहचाना।
हथुआ मार्केट की यह शाम इस बात की गवाही बन गई कि जब शायरी ईमानदार होती है और शायर अपने समय से आँख मिलाकर बात करता है, तब एक शेर भी इतिहास का दस्तावेज़ बन सकता है।
और शायद इसी लिए—

जान दे दें, बिहार वाले हैं…”
उस रात सिर्फ़ पढ़ा नहीं गया,

पूरी महफ़िल ने उसे जी लिया।

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