भारतीय समाचार पत्र दिवस पर विशेष- “29 जनवरी” चेतना का दिवस
हर वर्ष 29 जनवरी भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्मृति के रूप में उपस्थित होता है। सामान्य जन के लिए

यह तिथि भले ही एक साधारण दिन हो, किंतु पत्रकारिता से जुड़े लोगों और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने वाले समाज के लिए यह दिन विशेष अर्थ रखता है। यही वह तिथि है जिसे भारतीय समाचार पत्र दिवस के रूप में चिह्नित किया गया है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि भारत में समाचार पत्रों की परंपरा केवल सूचनाओं के संप्रेषण के उद्देश्य से नहीं प्रारंभ हुई थी, बल्कि उसका मूल उद्देश्य सत्ता से प्रश्न करना, समाज को जागरूक करना और आम नागरिक की आवाज़ को सार्वजनिक मंच प्रदान करना था।
वर्तमान समय में, जब सूचना के स्रोत अत्यधिक बढ़ चुके हैं और डिजिटल माध्यमों ने समाचार उपभोग की आदतों को बदल दिया है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या समाचार पत्रों की प्रासंगिकता कम हो गई है। किंतु यदि गहराई से विचार किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि समाचार पत्र केवल समाचार देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे लोकतांत्रिक विमर्श की बुनियाद हैं। यदि समाचार पत्र न हों, तो सत्ता से निरंतर, तार्किक और तथ्यात्मक प्रश्न पूछने वाली संस्थागत व्यवस्था का अभाव हो जाएगा।
भारतीय समाचार पत्र दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 29 जनवरी 1780 से जुड़ी हुई है। उस समय न भारत स्वतंत्र था, न लोकतंत्र की कोई अवधारणा थी और न ही नागरिक अधिकारों की कोई स्पष्ट व्यवस्था। ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन था, जिसमें सत्ता कुछ मुट्ठीभर अधिकारियों के हाथों में केंद्रित थी और आम जनता की कोई प्रभावी सुनवाई नहीं थी।
इसी वातावरण में जेम्स ऑगस्टस हिक्की नामक व्यक्ति ने भारत का पहला मुद्रित समाचार पत्र प्रकाशित किया। यह अख़बार ‘बंगाल गजट’ के नाम से जाना गया, जिसे बाद में ‘हिक्की का गजट’ कहा जाने लगा। यह केवल भारत का ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया का पहला समाचार पत्र था। हिक्की न तो किसी राजनीतिक आंदोलन का नेता था और न ही किसी संगठित क्रांति का हिस्सा। उसके पास केवल लेखन का साहस, विचारों की स्पष्टता और सत्ता से टकराने की इच्छाशक्ति थी।
हिक्की के गजट की सबसे बड़ी विशेषता उसका स्पष्ट और निर्भीक दृष्टिकोण था। यह कोई सरकारी अनुग्रह प्राप्त प्रकाशन नहीं था, बल्कि एक ऐसा मंच था जो सत्ता के प्रभाव से मुक्त रहने का दावा करता था। अख़बार के शीर्ष पर छपा यह वाक्य -“सबके लिए खुला, लेकिन किसी के दबाव में नहीं”…..उस दौर में पत्रकारिता की स्वतंत्रता का स्पष्ट घोषणापत्र था।
हिक्की ने ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग, नैतिक पतन और निजी आचरण पर खुलेआम लिखा। उसने तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की नीतियों और कार्यशैली की भी आलोचना की। उस समय इस प्रकार की निर्भीकता सीधे सत्ता को चुनौती देने के समान थी।
आज के समय में पत्रकारों को आलोचना के बदले ट्रोलिंग, कानूनी नोटिस या संस्थागत दबावों का सामना करना पड़ता है, किंतु उस दौर में ऐसी आलोचना का परिणाम सीधा कारावास होता था।
हिक्की का अख़बार आधुनिक अर्थों में केवल “गंभीर” समाचारों तक सीमित नहीं था। उसमें राजनीति और व्यापार के साथ-साथ उस समय के सामाजिक और प्रशासनिक जीवन से जुड़ी चर्चाएँ, टिप्पणियाँ और तथाकथित गॉसिप भी प्रकाशित होती थीं।
इन प्रकाशनों के माध्यम से सत्ता और समाज के बीच छिपे संबंध उजागर होते थे। इसी कारण हिक्की के प्रयासों को भारत में खोजी पत्रकारिता की प्रारंभिक अभिव्यक्ति माना जा सकता है।
हिक्की का यह विश्वास था कि सत्य केवल आधिकारिक दस्तावेज़ों में नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार और सत्ता के क्रियाकलापों में निहित होता है। जब ब्रिटिश शासन की सहनशीलता समाप्त हो गई, तो हिक्की को कारावास में डाल दिया गया। किंतु यह तथ्य भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में विशेष महत्व रखता है कि हिक्की ने जेल में रहते हुए भी लेखन और प्रकाशन का प्रयास जारी रखा।
अंततः ब्रिटिश सरकार ने उसका प्रिंटिंग प्रेस जब्त कर लिया और मात्र दो वर्षों के भीतर ‘बंगाल गजट’ का प्रकाशन बंद हो गया। व्यक्तिगत रूप से हिक्की पराजित हुआ, किंतु वैचारिक रूप से उसकी लड़ाई अमर हो गई।
हिक्की का जीवन किसी आदर्शवादी नायक की तरह समाप्त नहीं हुआ। आर्थिक अभाव, सामाजिक उपेक्षा और अकेलापन उसके अंतिम दिनों की पहचान बने। कहा जाता है कि उसकी मृत्यु एक जहाज़ पर हुई और उसके पास अंतिम संस्कार के लिए भी पर्याप्त धन नहीं था।
फिर भी इतिहास में किसी व्यक्ति का मूल्य उसकी संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके साहस और योगदान से तय होता है। हिक्की इसीलिए स्मरणीय है क्योंकि उसने यह सिद्ध किया कि समाचार पत्र सत्ता का उपकरण नहीं, बल्कि जनता का प्रश्नपत्र होता है।
आज समाचार पत्र तकनीकी रूप से अधिक सक्षम हैं। विषयों की विविधता बढ़ी है और सूचना की पहुंच व्यापक हुई है। फिर भी मूल प्रश्न वही है -क्या समाचार पत्र आज भी उतनी ही निर्भीकता से सत्ता से प्रश्न कर पा रहे हैं?
यह निर्विवाद है कि समाचार पत्र केवल सूचना नहीं देते, बल्कि सामाजिक विमर्श को दिशा देते हैं। राजनीति, अर्थव्यवस्था, कृषि, विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करना आज भी समाचार पत्रों की विशिष्ट पहचान है।
डिजिटल माध्यम त्वरित सूचना प्रदान करते हैं, किंतु समाचार पत्र घटनाओं की पृष्ठभूमि, प्रभाव और निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। यही उनका स्थायी महत्व है।
आज भी अनेक परिवारों में सुबह की शुरुआत अख़बार से होती है। यह केवल सूचना नहीं, बल्कि अध्ययन, विवेक और तुलना की आदत विकसित करता है। इसी सोच के तहत कुछ राज्य सरकारों ने विद्यालयों में अख़बार पढ़ने की पहल की है, ताकि बच्चों में विचारशीलता और सामाजिक समझ विकसित हो सके।
लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि सतत प्रश्नोत्तर से जीवित रहता है। और इस प्रक्रिया का सबसे सशक्त माध्यम समाचार पत्र हैं।
29 जनवरी केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं है। यह उस चेतना का प्रतीक है, जिसने भारत में पत्रकारिता को सत्ता का प्रतिरोधक और समाज का प्रहरी बनाया। हिक्की का गजट भारतीय पत्रकारिता की वही पहली चिंगारी था, जिसने प्रश्न पूछने की परंपरा की नींव रखी।
समाचार पत्र तब भी सत्य के पक्ष में खड़े थे,
समाचार पत्र आज भी सत्य के पक्ष में खड़े हैं –
आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम उनके महत्व को समझें और इस परंपरा को जीवित रखें।
पूर्णेंदु पुष्पेश
संपादक, राष्ट्रीय मुख्यधारा
