सम्पादकीय

सोशल मीडिया के शोर में दबती आम आवाज, “मनु कि रविवारीय” मे आज पढ़िए- वैश्विक मुद्दों पर आम आदमी की बेबसी

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

वैश्विक संकट और आम आदमी

एक आम आदमी की तरह मैं भी सोच रहा हूं कि हालिया वैश्विक संकट पर अपना ज्ञान आप सभी से साझा कर ही डालूं। बड़ी

मनीश वर्मा ‘ मनु
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

उत्कट इच्छा है मेरी।
जब मैं सोशल मीडिया पर एंकर और पैनलिस्ट की बातें सुनता हूं, तब मेरे अंदर से एक हूक-सी उठती है—इन लोगों ने तो अपनी-अपनी बातें, अपने ज्ञान के मुतल्लिक़ कह लीं, परंतु एक आम आदमी क्या सोचता है, वो क्या करना और कहना चाहता है,यह बातें तो हुई ही नहीं।
थोड़ा-बहुत अखबार मैं भी पढ़ता हूं। सोशल मीडिया पर भी मेरी नज़र रहती है—आखिर क्यों न रहे? सब मर्ज़ की दवा जो है। यहां वैश्विक कूटनीति तय होती है, युद्धों के परिणाम घोषित होते हैं, चुनावों के परिणाम घोषित किए जाते हैं और तो और वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं चुटकियों में ऊपर-नीचे हो जाती हैं।
जिन चीज़ों के लिए लोग अच्छी-खासी ट्रेनिंग लेकर आते हैं, दिन-रात एक करके, रातों की नींद हराम करके पढ़ाई करते हैं—वह सब अब कहां मायने रखती हैं! सब कुछ मिनटों के वीडियो और कुछ सेकंड की रील में समाहित हो गया है । ज्ञान का यह लोकतंतरीकरण है या सरलीकरण , यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है ।
सोचता हूँ कि मौका मिले तो मैं भी वहां जाकर अपने ज्ञान का पिटारा खोल ही दूं। हां, एक तकलीफ मुझे आ सकती है—मेरा दायरा असीमित है, जो शायद सबकी समझ में न आए, और मुझे वहां से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।
कभी-कभी मैं रील भी देख लेता हूं। परम ज्ञानियों की बातें, उनके श्रीमुख से विजुअली सुनना—भला कौन नहीं चाहेगा!
खैर, मेरे लिए तो वैश्विक संकट मेरे व्यक्तिगत हितों से जुड़ा हुआ है। शायद एक आम आदमी की भी यही सोच है। सबसे पहली और अहम बात यह है कि एक आम आदमी के पास दाल-रोटी की जद्दोजहद से हटकर इतनी फुर्सत कहां कि वह और कुछ सोच सके या उसका ध्यान उस पर जाए।
जब रोटी-दाल पर मुसीबत आती है, उसका बजट इधर से उधर होता है तभी उसका ध्यान वैश्विक संकट की ओर जाता है, और वह उस बारे सोचना शुरू करता है। सबकी सोच अलग-अलग होती है, पर आम आदमी की सोच बेचारी सिलेंडर और पेट्रोल-डीज़ल की उपलब्धता और उनकी कीमत से आगे बढ़ ही नहीं पाती। शायद उसने अपने सोच का दायरा ही उससे आगे बढ़ाया ही नहीं है।
बड़े साहब की सोच डॉलर के इर्द-गिर्द ही घूमती नज़र आती है, तो कुछ लोग आमादा हैं सब कुछ बर्बाद कर देने को। कुछ लोग तो बिल्कुल किनारे पर खड़े हैं—बस मौके का इंतज़ार है; वरना इधर से उधर होने में समय ही कितना लगता है।
हर किसी को किसी न किसी से शिकायत है। और इस बीच, हम उन “सबसे बड़े साहब” की ओर देखते हैं, जिन्हें हमने कभी इसलिए बड़ा माना था कि वे आगे बढ़कर झगड़े सुलझाएंगे। पर अब लगता है कि उनका दायरा भी हमने ही सीमित कर दिया है। वो भी शायद दर्शक की भूमिका में ही हैं ।
अब तो भगवान ही मालिक है। वैसे भी हम लोग प्रारब्ध को मानने वाले लोग हैं। जो हो रहा है, उसे हम सही या गलत नहीं कहते—हम तो बस इसे नियति मान बैठे हैं। नियति और पुरुषार्थ के बीच का द्वंद्व कोई आज की बात नहीं है । हज़ारों साल से यह बात चलती चली आ रही है । हम और आप इसे अपने अपने तरीके से परिभाषित कर सकते है, पर निष्कर्ष पर पहुंचना शायद मुश्किल है ।
ग़ालिब साहब ने बिल्कुल सही फ़रमाया है-
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत, लेकिन
दिल को बहलाने के लिए ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।”

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