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सतुआनी को जन-जन तक ले जाने की अपील, मंदिरों से निकलकर बस्तियों तक पहुंचाने का आह्वान

पटना. बिहार में पारंपरिक पर्व सतुआनी को लेकर इस बार खास तैयारी का संदेश दिया गया है। बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अध्यक्ष प्रो. रणबीर नंदन ने कहा है कि 14 अप्रैल को राज्य के सभी मठ और मंदिरों में सतुआनी मनाई जाएगी। उन्होंने इसे सामाजिक समरसता से जोड़ते हुए लोगों से एक विशेष अपील भी की है।

उन्होंने कहा कि मंदिरों और मठों से जुड़े लोग इस दिन समाज के अंतिम पायदान पर रहने वाले लोगों की बस्तियों में जाएं। उन्हें इस पर्व से जोड़ें। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक परंपरा नहीं है, बल्कि समाज को जोड़ने का अवसर भी है। इसलिए इसे सीमित दायरे में नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर मनाया जाना चाहिए।

प्रो. नंदन ने कहा कि सतुआनी का पर्व बिहार और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में लंबे समय से मनाया जाता रहा है। इस दिन लोग सुबह गंगा स्नान करते हैं। इसके बाद भगवान शिव की पूजा की जाती है। पारंपरिक रूप से इस दिन सत्तू का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा आज भी कई जगहों पर जारी है। यह पर्व नई फसल से भी जुड़ा हुआ है। खेतों से आई नई उपज का सम्मान किया जाता है। किसान इसे प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन मानते हैं। इस दिन सत्तू खाने की परंपरा इसलिए भी है क्योंकि यह आम लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध और पौष्टिक आहार है।

प्रो. रणबीर नंदन ने कहा कि सतुआनी ऐसा पर्व है जो हर वर्ग के लोगों में समान रूप से प्रचलित है। इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं है। सत्तू हर घर तक पहुंचता है। इसी कारण यह पर्व सामाजिक समानता का प्रतीक भी माना जाता है। उन्होंने सभी सनातन परंपरा को मानने वाले लोगों से आग्रह किया है कि वे इस पर्व के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ें। खासकर उन लोगों तक पहुंचें जो सामाजिक रूप से पीछे हैं। इससे समाज में एकता का संदेश जाएगा।

सतुआनी का आध्यात्मिक पक्ष भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन संयम, सादगी और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। इस दिन सादा भोजन किया जाता है। लोग अपने जीवन में संतुलन और सरलता अपनाने का संकल्प लेते हैं। यह पर्व ऋतु परिवर्तन का भी संकेत देता है। गर्मी के मौसम की शुरुआत के साथ शरीर और खानपान में बदलाव का संदेश देता है। सत्तू जैसे ठंडे और पौष्टिक आहार का सेवन इसी सोच का हिस्सा माना जाता है।

इस बार धार्मिक न्यास पर्षद की अपील के बाद उम्मीद की जा रही है कि सतुआनी का आयोजन और व्यापक रूप लेगा। मंदिरों से निकलकर यह पर्व बस्तियों और गांवों तक पहुंचेगा। इससे सामाजिक जुड़ाव और परंपरा दोनों को नई मजबूती मिलेगी।

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