सम्पादकीय

भक्ति के दरबार में दो तस्वीरें, “मनु की रविवारीय” में आज पढ़िए श्रद्धा की आज़ादी और मुफ़्तख़ोरी की मजबूरी

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

सर्वदेव मंदिर के बहाने

मेरे घ के पास ही कुछ दूरी पर एक मंदिर है। घर से निकलकर चाहे हम अपने कार्यालय जाएँ या कहीं और—रास्ता वही है। उस मंदिर को अनदेखा कर आगे बढ़ पाना लगभग असंभव है।
मंदिर क्या है—एक तरह से Pantheon है। यह एक रोमन शब्द

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

है। प्राचीन रोम में जहाँ अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ एक ही स्थान पर स्थापित होती थीं, उस स्थान को Pantheon कहा जाता था। हमारे यहाँ भी ऐसी परंपरा है। जहाँ विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ एक साथ स्थापित होती हैं, उसे सर्वदेव मंदिर, विश्व देवालय या देवकुल जैसे नामों से जाना जाता है। हालांकि, आम बोलचाल में वह भी एक “मंदिर” ही है।
खैर, इस तरह के मंदिरों की एक विशेषता मुझे हमेशा अच्छी लगती है—यहाँ आप अपने-अपने इष्टदेव की पूजा करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। कोई प्रश्न नहीं, कोई रोक-टोक नहीं। वैसे भी आस्था के सामने कोई तर्क नहीं । मानो तो देव नहीं तो पत्थर ।कुछ लोग तो हर एक देवता के सामने मत्था टेकते हुए दिखाई देते हैं। शायद उनके मन में यह भाव होता है कि पता नहीं कब कौन से भगवान प्रसन्न हो जाए और कौन-से नाराज़। भगवान की कृपा कौन नहीं चाहता! पर भगवान के रुष्ट होने का विचार—तौबा-तौबा—मन में आना भी नहीं चाहिए।
मनु ने तो अपना एक सरल-सा सिद्धांत बना रखा है—किसी की नाराज़गी मोल नहीं लेनी है। थोड़ा-सा सिर झुका देने में भला हर्ज ही क्या है?
पर इस सर्वदेव मंदिर से गुज़रते हुए एक और दृश्य बार-बार ध्यान खींचता है। अक्सर दो-चार लोग ऐसे दिख जाते हैं जिन्होंने मानो एक नियम बना रखा हो—मंदिर के खुलने से लेकर बंद होने तक वहीं आसन जमाए रखना। अधिकतर बुजुर्ग हैं। शायद वे मंदिर आने-जाने वालों की कृपादृष्टि और अक्सर वहाँ चलने वाले भंडारे पर ही आश्रित हैं। पता नहीं उनके अपने लोग हैं भी या नहीं।
उन्हें देखकर मन विचलित हो उठता है। कष्ट भी होता है—चिलचिलाती धूप हो, मूसलाधार बारिश या कड़ाके की ठंड—वे वहीं बैठे रहते हैं। यह दृश्य अनायास ही सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देता है।

शायद वे लोग हैं जिन्हें उनके अपनों ने ही उनकी नियति के हवाले कर दिया है। उनकी दुनिया अब मंदिर के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई है। जाएँ भी तो कहाँ जाएँ?
कभी-कभी यह सब देखकर मन में अनेक विचार उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। प्रश्न उठते हैं, उत्तर नहीं मिलते। अंततः थककर मैं सब कुछ नियति पर छोड़ देता हूँ। मेरा पुरुषार्थ जैसे हार मान लेता है।
लेकिन मंगलवार, शनिवार या किसी विशेष पूजा के दिन एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है। वहाँ कुछ ऐसे लोग भी जुट जाते हैं जो शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्षम होते हैं, फिर भी उसी भीड़ का हिस्सा बने रहते हैं। शायद मुफ़्त में मिलने वाली चीज़ों की आदत उन्हें यहाँ खींच लाती है।
एक बार जिन्हें मुफ़्तख़ोरी की यह आदत लग जाए, तो स्वाभिमान और अभिमान दोनों धीरे-धीरे किनारे लग जाते हैं। वे भी शायद इसे ही अपनी नियति मान बैठते हैं—या शायद उनका पुरुषार्थ उन्हें झकझोरने में असफल रहता है।

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