ज़िंदा रहते खुद की तेरहवीं, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- एक बुज़ुर्ग की पीड़ा ने समाज को दिखाया आईना
घर…
जहाँ इंसान अपने आप को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करता है।
जहाँ से उसे पुरज़ोर सम्मान और भरोसे की उम्मीद होती है।
जहाँ बिना लाग-लपेट के अपनी बात कही जा सकती है, बिना इस

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
चिंता के कि सामने वाला क्या सोचेगा। उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी । परिणाम क्या होगा ।
लेकिन जब उसी घर में किसी को अपेक्षित सम्मान और विश्वास न मिले, तो यह केवल एक कमी नहीं रह जाती—बल्कि दिल पर गहरी चोट का सबब बन जाती है। तब बाहर की प्रतिष्ठा, सम्मान और पहचान सब बेमानी लगने लगती है ।
सबसे अधिक तकलीफ़ तब होती है, जब अपने ही घर में व्यक्ति खुद को दोयम दर्जे का महसूस करने लगे। जिस घर को उसने अपना सब कुछ समझा, जिसके लिए उसने अपना वक़्त, अपना श्रम और अपनी भावनाएँ समर्पित कीं—वहीं वह खुद को बेगाना पाए। उसके अनुभव और अस्तित्व दोनों ही हाशिये पर चले जाएँ। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि भावनाएँ आहत होंगी और भरोसा डगमगाएगा । यहाँ घर का मतलब सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ नहीं है । यह आपका दफ़्तर, आपका सामाजिक परिवेश मतलब समाज कुछ भी हो सकता है । आपकी भावनाएँ आहत होती हैं जब चोट अपनों से लगती है ।
कभी-कभी यह समझ पाना भी मुश्किल हो जाता है कि जो हम महसूस कर रहे हैं, वह सच है या परिस्थितियों का प्रभाव। लेकिन इतना तय है कि यह तकलीफ़ भीतर तक असर करती है। यही तकलीफ़ इंसान के कदमों को भटका देती है, और फिर वही बात शहर की ख़बर बन जाती है।
हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया। इस ख़बर ने मानो हमारे सामाजिक रिश्तों पर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया?
एक व्यक्ति—उम्र 60 वर्ष से अधिक—ने कुछ ऐसा किया, जो असामान्य होने के साथ-साथ बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है।
उसने “ज़िंदा भंडारा” शीर्षक से निमंत्रण पत्र छपवाए—अपने जीते-जी अपनी ही तेरहवीं करने के लिए।
निमंत्रण पत्र पर लिखी पंक्तियाँ उसकी मनःस्थिति को स्पष्ट करती हैं—
“हमें अपनों ने लूटा, ग़ैरों में कहाँ दम था,
मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहाँ पानी कम था।”
इन पंक्तियों से यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उसे अपने ही लोगों से अपेक्षित स्नेह और सम्मान नहीं मिला। उसने कुछ लोगों से यह भी कहा कि उसे अकेलापन सताता है और यह डर भी है कि उसके निधन के बाद उसके अपने शायद अंतिम संस्कार भी न करें।
शुरुआत में तो लोगों ने इसे मज़ाक समझा, लेकिन जब उसकी गंभीरता सामने आई, तो समाज ने उसके भावनाओं को समझा।
उसके “ज़िंदा भंडारे” में लगभग दो हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल हुए और प्रसाद ग्रहण किया।
यह आयोजन भले ही अनोखा था, लेकिन यह समाज और परिवार दोनों के लिए एक गहरी सीख भी है-
इतने लोगों के बीच रहते हुए भी अगर कोई व्यक्ति इतना अकेला महसूस करे कि उसे इस तरह का कदम उठाना पड़े, तो यह केवल उसकी नहीं—हम सबकी संवेदनाओं पर प्रश्नचिह्न है।
मनीष वर्मा “मनु”
