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कानून, नैतिकता और जीवन के बीच चिकित्सक की दुविधा

डॉ. सत्यवान सौरभ

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मानव जीवन की रक्षा, उपचार और संवर्धन के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल की हैं। आज ऐसे अनेक रोगों का उपचार संभव है जिन्हें कभी असाध्य माना जाता था। गर्भस्थ शिशु की स्वास्थ्य स्थिति का सूक्ष्म परीक्षण, जन्मजात विकृतियों की पहचान तथा मातृ स्वास्थ्य की निगरानी जैसी तकनीकों ने चिकित्सा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। किंतु विज्ञान की इस प्रगति के साथ कुछ जटिल नैतिक और कानूनी प्रश्न भी सामने आए हैं। विशेष रूप से तब, जब चिकित्सकों के सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ कानून की सीमाएँ और जीवन बचाने का उनका मूल कर्तव्य एक-दूसरे से टकराते प्रतीत होते हैं। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन से जुड़े मामले इसी प्रकार की चुनौतीपूर्ण स्थिति प्रस्तुत करते हैं।

डॉ सत्यवान सौरभ

चिकित्सा व्यवसाय का मूल सिद्धांत जीवन की रक्षा करना है। प्राचीन हिप्पोक्रेटिक शपथ से लेकर आधुनिक चिकित्सा नैतिकता तक, चिकित्सकों को रोगी के हित को सर्वोपरि रखने की शिक्षा दी जाती है। “किसी को हानि न पहुँचाना” और “रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना” चिकित्सा आचारशास्त्र के आधारभूत सिद्धांत हैं। दूसरी ओर, चिकित्सक किसी लोकतांत्रिक समाज में कानून से ऊपर नहीं हो सकते। उन्हें विधिक प्रावधानों, न्यायालयों के आदेशों और राज्य द्वारा निर्धारित मानकों का पालन भी करना पड़ता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी विशेष मामले में कानूनी आदेश और चिकित्सकीय नैतिकता अलग-अलग दिशा में संकेत देने लगते हैं।

भारत में गर्भसमापन से संबंधित कानूनी ढाँचा मुख्य रूप से चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम (Medical Termination of Pregnancy Act) पर आधारित है। समय-समय पर इसमें संशोधन कर महिलाओं के प्रजनन अधिकारों, स्वास्थ्य सुरक्षा और बदलती चिकित्सकीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया है। इसके बावजूद अनेक ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें गर्भावस्था उन्नत अवस्था में पहुँच चुकी होती है और भ्रूण व्यवहार्य अर्थात गर्भ के बाहर भी जीवित रहने में सक्षम माना जाता है। ऐसी स्थिति में यदि भ्रूण में गंभीर विकृतियाँ पाई जाएँ, या गर्भवती महिला का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा हो, तो गर्भसमापन का प्रश्न केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे नैतिक विमर्श का विषय बन जाता है।

व्यवहार्य भ्रूणों के संदर्भ में सबसे बड़ी नैतिक चुनौती यह है कि चिकित्सक एक साथ दो जीवनों से संबंधित निर्णय का सामना कर रहे होते हैं। एक ओर गर्भवती महिला की स्वायत्तता, स्वास्थ्य और गरिमा का प्रश्न है, वहीं दूसरी ओर उस भ्रूण का संभावित जीवन है जो चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से जीवित रहने में सक्षम हो सकता है। यदि कानून गर्भसमापन की अनुमति देता है, तब भी चिकित्सक के सामने यह प्रश्न बना रहता है कि क्या वे उस प्रक्रिया में भाग लें जो एक संभावित जीवन का अंत कर सकती है। इसके विपरीत, यदि कानून अनुमति नहीं देता लेकिन महिला का जीवन या मानसिक स्वास्थ्य गंभीर खतरे में है, तो चिकित्सक स्वयं को नैतिक रूप से हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य महसूस कर सकते हैं।

चिकित्सा नैतिकता में रोगी की स्वायत्तता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। प्रत्येक सक्षम वयस्क व्यक्ति को अपने शरीर और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है। गर्भावस्था के मामलों में यह अधिकार विशेष महत्व रखता है क्योंकि गर्भधारण और प्रसव का प्रत्यक्ष प्रभाव महिला के शरीर, स्वास्थ्य और जीवन पर पड़ता है। किंतु व्यवहार्य भ्रूणों की स्थिति में यह अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं रह जाता। समाज और कानून दोनों भ्रूण के संभावित जीवन को भी एक नैतिक मूल्य के रूप में स्वीकार करते हैं। परिणामस्वरूप चिकित्सक महिला की इच्छा और भ्रूण के हितों के बीच संतुलन बनाने की कठिन जिम्मेदारी का सामना करते हैं।

देर से गर्भसमापन के मामलों में भ्रूण संबंधी गंभीर विकृतियाँ अक्सर निर्णय को और जटिल बना देती हैं। कई बार चिकित्सकीय परीक्षणों से पता चलता है कि भ्रूण ऐसे रोग या विकार से ग्रस्त है जो जन्म के बाद जीवन को अत्यंत कष्टदायक बना देगा अथवा जीवित रहने की संभावना नगण्य होगी। ऐसे मामलों में गर्भावस्था जारी रखना माता-पिता और भावी बच्चे, दोनों के लिए गंभीर मानसिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है। चिकित्सक यदि गर्भसमापन का समर्थन करते हैं तो वे पीड़ा को कम करने के सिद्धांत का पालन कर रहे होते हैं। लेकिन यदि भ्रूण व्यवहार्य अवस्था में पहुँच चुका है, तो वही निर्णय जीवन समाप्त करने की नैतिक आलोचना का कारण भी बन सकता है।

न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले आदेश भी चिकित्सकों के लिए दुविधा उत्पन्न कर सकते हैं। अनेक मामलों में अदालतें विशेषज्ञ चिकित्सा बोर्डों की राय के आधार पर गर्भसमापन की अनुमति देती हैं या उसे अस्वीकार करती हैं। हालांकि अंतिम आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है, फिर भी प्रक्रिया को अंजाम देने वाले चिकित्सकों को अपने नैतिक विवेक से जूझना पड़ता है। वे जानते हैं कि कानून ने अनुमति दी है, लेकिन व्यक्तिगत और पेशेवर स्तर पर वे उस निर्णय को लेकर असहज हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि अदालत अनुमति नहीं देती और चिकित्सक को लगता है कि महिला का स्वास्थ्य गंभीर संकट में है, तो वे स्वयं को नैतिक रूप से विवश अनुभव कर सकते हैं।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू चिकित्सा उत्तरदायित्व का है। चिकित्सकों को न केवल नैतिक बल्कि कानूनी परिणामों का भी सामना करना पड़ सकता है। यदि वे कानूनी प्रावधानों से बाहर जाकर निर्णय लेते हैं तो उन पर आपराधिक या व्यावसायिक कार्रवाई हो सकती है। वहीं यदि वे केवल कानूनी सुरक्षा के लिए ऐसा निर्णय लेते हैं जो रोगी के हित में नहीं है, तो चिकित्सा नैतिकता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है। इस प्रकार वे दोहरी जवाबदेही के बीच फँस जाते हैं—एक कानून के प्रति और दूसरी अपने पेशे के नैतिक आदर्शों के प्रति।

ऐसे मामलों में चिकित्सा बोर्डों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। बहुविषयक विशेषज्ञ समितियाँ विभिन्न चिकित्सा, नैतिक और सामाजिक पहलुओं का समग्र मूल्यांकन कर सकती हैं। इससे निर्णय किसी एक चिकित्सक की व्यक्तिगत धारणा पर आधारित न होकर सामूहिक विशेषज्ञता पर आधारित होता है। फिर भी अंतिम निर्णय का नैतिक भार अक्सर उन चिकित्सकों पर ही रहता है जो प्रक्रिया को क्रियान्वित करते हैं। इसलिए संस्थागत समर्थन और स्पष्ट दिशानिर्देशों की आवश्यकता बनी रहती है।

समाज की बदलती संवेदनाएँ भी इस बहस को प्रभावित करती हैं। एक ओर महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर विकलांगता अधिकारों और भ्रूण जीवन के संरक्षण की वकालत करने वाले समूह भी सक्रिय हैं। चिकित्सक इन परस्पर विरोधी सामाजिक अपेक्षाओं के बीच कार्य करते हैं। उनके निर्णयों का मूल्यांकन केवल चिकित्सा मानकों से नहीं बल्कि नैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोणों से भी किया जाता है। इससे उन पर अतिरिक्त मानसिक दबाव पड़ता है।

मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। देर से गर्भसमापन से जुड़े मामलों में चिकित्सक, माता-पिता और स्वास्थ्यकर्मी सभी भावनात्मक तनाव का अनुभव कर सकते हैं। जीवन और मृत्यु से जुड़े निर्णय केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं होते; वे गहरे मानवीय अनुभव होते हैं। कई चिकित्सक नैतिक संकट, अपराधबोध या भावनात्मक थकान का सामना करते हैं। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था को उनके लिए भी मनोवैज्ञानिक और नैतिक परामर्श की व्यवस्था करनी चाहिए।

इस पूरे विमर्श में यह समझना आवश्यक है कि कानून और नैतिकता हमेशा विरोधी नहीं होते। दोनों का उद्देश्य अंततः मानव कल्याण और न्याय की स्थापना ही है। लेकिन वास्तविक जीवन की जटिल परिस्थितियों में उनके बीच तनाव उत्पन्न हो सकता है। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन के मामले यही दर्शाते हैं कि किसी भी नियम या सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मामले की अपनी विशिष्ट परिस्थितियाँ होती हैं जिनका संवेदनशील और विवेकपूर्ण मूल्यांकन आवश्यक है।

आगे बढ़ते हुए आवश्यकता इस बात की है कि कानून अधिक स्पष्ट, वैज्ञानिक और मानवीय बने। न्यायालयों, चिकित्सा संस्थानों और नीति-निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए। चिकित्सकों को नैतिक निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षण और संस्थागत समर्थन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही महिला की गरिमा, स्वायत्तता और स्वास्थ्य के साथ-साथ भ्रूण जीवन के नैतिक महत्व को भी संतुलित रूप से स्वीकार किया जाए। केवल कानूनी औपचारिकताओं या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के आधार पर ऐसे मामलों का समाधान संभव नहीं है।

अंततः चिकित्सक केवल तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होते; वे जीवन से जुड़े सबसे कठिन निर्णयों के साक्षी और सहभागी भी होते हैं। जब कानूनी आदेश और जीवन बचाने का उनका प्राथमिक कर्तव्य परस्पर टकराते हैं, तब उनकी भूमिका और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन से जुड़े मामले हमें यह याद दिलाते हैं कि चिकित्सा केवल विज्ञान नहीं, बल्कि संवेदना, नैतिकता और मानवीय विवेक का भी क्षेत्र है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर श्वेत-श्याम नहीं होते; वे अनेक धूसर क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम चिकित्सकों को दोषी या नायक के सरल खाँचों में न बाँधें, बल्कि उन जटिल परिस्थितियों को समझें जिनमें वे मानव जीवन, कानून और नैतिकता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

 डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

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