सम्पादकीय

चमकते बाज़ार से अस्पताल की चौखट तक, “मनु की रविवारीय में आज पढ़िए”- महानगर का सबसे कड़वा सच

किसी काम से दिल्ली आना हुआ। काम क्या था—एक पारिवारिक समारोह में शामिल होना था। नौकरीपेशा लोगों के लिए कार्यालयी दिनों में छुट्टियाँ लेना हमेशा एक चुनौती होती है। फिर भी जीवन में

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

दफ़्तर, परिवार और समाज—तीनों के बीच सामंजस्य बैठाना ही पड़ता है। आखिर ये तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें से किसी एक की उपेक्षा कर दी जाए, तो जीवन कहीं न कहीं अधूरा-सा लगने लगता है। कुछ कुछ छूट जाने का अहसास दिलाने लगता है ।
खैर!
अपने शहर में रहते हुए बहुत कुछ देखना और महसूस करना संभव नहीं हो पाता है । हम कुछ-कुछ उस ताँगे में जुते घोड़े जैसे हो जाते हैं, जिसकी दोनों आँखों पर पट्टी बाँध दी जाती है ताकि उसकी नज़र इधर-उधर न भटके और वह बस सीधा चलता रहे। रोज़मर्रा की भागदौड़ भी हमारे साथ कुछ ऐसा ही व्यवहार करती है।
दिल्ली में स्थिति कुछ अलग थी। किसी अपने से मिलने सफदरजंग एन्क्लेव जाना था। मिलने का समय तय था और हमारे पास ओला या उबर लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। हमने उबर बुक की और हमारा सफ़र शुरू हुआ।
जहाँ हम ठहरे थे, वहाँ से सफदरजंग एन्क्लेव जाने का रास्ता दक्षिण दिल्ली के प्रसिद्ध इलाकों—साउथ एक्सटेंशन और लाजपत नगर—से होकर गुजरता था। सड़क के दोनों ओर बड़ी-बड़ी कंपनियों के शोरूम, नामी-गिरामी ब्रांडों की जगमगाती दुकानें, आलीशान गाड़ियों से उतरते लोग—सब कुछ किसी दूसरी ही दुनिया का दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे।
और इधर हम ठहरे एक छोटे शहर से आने वाले नौकरीपेशा व्यक्ति जिनकी दुनिया अक्सर रोटी, दाल और रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों तक ही सिमट जाती है। उन चमचमाते बाज़ारों , आलीशान गाड़ियों और उनसे उतरने वाले लोगों को को हम बड़ी हसरत भरी निगाहों से देख रहे थे। साथ ही मन ही मन अपना सामान्य ज्ञान भी बढ़ा रहे थे कि कभी किसी बड़े ब्रांड की दुकान का नाम पूछा जाए तो बगलें न झाँकनी पड़ें। दोस्तों पर एक रौब पड़ता इस बात का कि वो यह सब नहीं जानते हैं और हम जानते हैं ।
गाड़ी अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी और मन अपनी कल्पनाओं की ओर। कभी-कभी आँखों में सपने भी तैर जाते थे। वैसे सपने तो हर कोई देखता है, लेकिन हमारे सपने वे थे जो खुली आँखों से देखे जाते हैं—यथार्थ से जन्मे, सीमाओं से बँधे और फिर भी उम्मीद से भरे हुए। दिवास्वप्न कह सकते हैं ।
तभी हमारी तंद्रा भंग हुई।
अचानक सामने एक विशाल भीड़ दिखाई दी। यह भीड़ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और सफदरजंग अस्पताल में इलाज कराने आए मरीजों और उनके परिजनों की थी। कुछ लोग अस्पताल के बाहर ज़मीन पर बैठे थे, कुछ फुटपाथों पर लेटे हुए थे ।
अमुमन हर चेहरा जैसे अपने भीतर कोई अनकहा संघर्ष समेटे हुए था। परेशानी, हताशा , निराशा और अनिश्चितता लगभग हर चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी। कहीं-कहीं स्वयंसेवी संस्थाओं की गाड़ियाँ खड़ी थीं, जो निःशुल्क भोजन वितरित कर रही थीं। लोग अनुशासित होकर पंक्तियों में खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।
लेकिन एक बात ने मुझे सबसे अधिक विचलित किया।
लगभग हर चेहरा भावशून्य था। न क्रोध, न शिकायत, न उम्मीद, न निराशा—मानो भावनाएँ भी लंबे इंतज़ार और पीड़ा के आगे थककर कहीं बैठ गई हों। शायद हर व्यक्ति के मन में बस एक ही प्रश्न था—“आख़िर इस पीड़ा से मुक्ति कब मिलेगी?”
उसी क्षण मेरे मन में एक अनायास तुलना उभर आई। मेरी आँखों के सामने अस्पताल के बाहर खड़ी यह भीड़ थी और स्मृति में वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, जहाँ कहा जाता है कि चिताओं की अग्नि कभी बुझती नहीं।
दोनों स्थानों पर जीवन और मृत्यु एक-दूसरे के बेहद निकट दिखाई देते हैं, लेकिन दोनों की प्रतीक्षा अलग-अलग है। दोनों का स्वरूप अलग है । उनकी प्रकृति भिन्न है ।
मणिकर्णिका घाट पर खड़े लोगों के चेहरों पर एक मिश्रित भाव दिखाई देता है। गहरा दुःख तो होता ही है, लेकिन उसके साथ एक संतोष भी होता है कि उन्होंने अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देकर उसके जीवन की यात्रा पूर्ण कर दी। वहाँ मृत्यु अंत है, पर उसके साथ मुक्ति की एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभूति भी जुड़ी होती है।
इसके विपरीत अस्पताल के बाहर खड़ी यह भीड़ जीवन से चिपकी हुई भी थी और उसी जीवन से जूझ भी रही थी। यहाँ हर व्यक्ति मृत्यु से नहीं, बल्कि जीवन को बचाने की लड़ाई लड़ रहा था। यहाँ मुक्ति का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि बीमारी, दर्द और अनिश्चितता से मुक्ति पाना था ।
दिल्ली की वही सड़क, जिसके एक ओर वैभव, चमक-दमक और उपभोक्तावाद अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा था, उसी सड़क से थोड़ी दूर जीवन का सबसे कठोर यथार्थ भी खड़ा था। शायद यही महानगर की सबसे बड़ी विडंबना है—जहाँ ऐश्वर्य और असहायता, दोनों एक-दूसरे से कुछ ही कदम की दूरी पर साथ-साथ चलते हैं।

मनीष वर्मा “मनु”

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