जब दफ़्तर की सड़क बन गई ‘माल रोड’, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- बाबुओं की आधे घंटे की आज़ादी का दिलचस्प व्यंग्य
चलिए आज आपको हम बाबूओं के ‘ माल रोड ‘ का दर्शन कराते हैं । क्यों ? चौंक गए न ! यह क्या कह रहे हैं हम । माल रोड ? यह तो आमतौर पर पर्यटक स्थलों पर पाया जाने वाला वो सीधा रास्ता

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
है जहाँ पर आप एक ही जगह पर घूम घूम कर वहाँ की ख़ूबसूरती रौनक़ और रोमांच का मज़ा ले सकते हैं । तो चलिए, चलते हैं माल रोड की ओर ।
इस सड़क के दोनों ही तरफ दफ़्तर ही दफ़्तर हैं । हालाँकि , आप यह नहीं कह सकते कि वहाँ मौजूद सारे दफ़्तर सरकारी दफ़्तर ही हैं । वैसे जब हम दफ़्तर शब्द इस्तेमाल करते हैं तो आमतौर पर लोगों का आशय सरकारी कार्यालयों से ही होता है । वैसे यह बात कभी सोलह आने सच हुआ करती थीं, पर बदलते हुए परिवेश में, आज के संदर्भ में हम अगर बातें करें तो यह बात सच्चाई के कुछ क़रीब तो है पर सोलह आना सच नहीं ।
वैसे आजकल के बच्चे कहाँ ‘ आना ‘ ‘ पैसा ‘ वगैरह समझते हैं ।
सड़क के दोनों तरफ़ दफ़्तर मतलब सरकारी भी और गैर सरकारी भी । अमुमन सभी दफ़्तरों में आने और जाने का समय एक सा ही होता है – सुबह के नौ-साढ़े नौ बजे से लेकर शाम के छह बजे तक, बीच में आधे घंटे का लंच ब्रेक ; कुछेक अपवादों को छोड़कर ।
एक बात हम यहाँ पर कहना चाहेंगे- क्या कभी आपने किसी फैक्ट्री के बाहर खड़े होकर वहाँ का दृश्य देखा है ?सुबह की सायरन की आवाज़ के साथ वहाँ के कामगारों की दिनचर्या शुरू होती है । लगभग भागते दौड़ते हुए हाथ में दोपहर के लंच के लिए डब्बा । एक हुजूम सा दिखता है । कुछ देर के बाद जब मेहनतकशों की भीड़ अंदर चली जाती है तो बाहर का नजारा देखकर ऐसा लगता है मानो कर्फ़्यू लगा दिया गया हो । वही कहानी शाम में पुनः दोहराई जाती है फिर उसी सायरन की आवाज़ के साथ कामगारों की फ़ौज बाहर निकलती है । चूँकि फ़ैक्टरियाँ आमतौर पर पारियों में चलती हैं और हर पारी में यही कहानी दोहराई जाती है । वहाँ के कामगारों की ज़िंदगी सायरन की आवाज़ के इर्द गिर्द ही घूमती है ।
खैर! हम बातें कर रहे थे सड़क के दोनों तरफ़ के दफ़्तरों के बारे में । सभी दफ़्तरों के लंच ब्रेक का समय आमतौर पर एक होता है कुछेक मिनट आगे या पीछे ।
वैसे मैं किस दफ़्तर में काम करता हूँ, कहाँ और किस शहर में काम करता हूँ, किस मार्ग पर स्थित है मेरा दफ़्तर आप कृपया जानने की कोशिश ना करें और ना हम बताने जा रहे हैं । बहुत सारे नियम और विनियम हमपर लागू होते हैं । क्यों उस पचड़े में पड़ना । नियम और विनियम बिल्कुल आकटोपस की तरह होते हैं । एक बार आप उसकी पकड़ में आ गए तो फिर………,
आज की दुनिया जहाँ विभिन्न प्रकार की मीडिया है ,गुगल बाबा हैं और तो और अब तो ए आई आ गया है जिसकी वजह से लोगों के ज्ञान चक्षु खुल गए हैं । हालाँकि पहले भी खुले हुए थे पर शायद सामने आकर इतनी सहजता से खड़े नहीं होते थे, पर अब हो जाते हैं ।
खैर! हम बातें कर रहे हैं लंच ब्रेक की तो हम वहीं पर लौट कर आते हैं। आजकल लोग लंच ब्रेक का उपयोग सिर्फ भोजन करने तक सीमित नहीं रखते हैं। अब उन्हें इस ब्रेक का इंतज़ार रहता है । अब लोग बाग लंच ब्रेक का इस्तेमाल लंच करके थोड़ा टहलने में गुजारते हैं । दफ़्तर की अपने कमरों की दीवारों से निकल खुले वातावरण में अपनी आँखों को थोड़ा सुकून देते हैं और साँसों को थोड़ा व्यवस्थित करते हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार थोड़ा चहलक़दमी कर लेने से उनके शरीर पर थोड़ा अनुकूल असर पड़ेगा । भाई यह बात तो हमेशा से सबको मालूम थी, पर कहाँ कोई अमल करता था । चलिए अच्छा है – ‘ जब जागे तभी सवेरा ‘ ।
लंच के वक़्त उस सड़क का दृश्य बिल्कुल बदल जाता है । लंच के वक़्त उस सड़क पर जहाँ हमारे दफ़्तर के अलावा और भी कई सरकारी और गैर सरकारी दफ़्तर मौजूद हैं तो वहाँ के कर्मचारी, यहाँ हम अधिकारी शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे क्योंकि वो लंच ब्रेक में अपने कक्ष से बाहर शायद ही निकलते हैं । लंच ब्रेक में अगर निकलते भी हैं तो गाड़ियों से । घर जाते हैं और लंच के बाद वापस आते हैं । उन्हें कहाँ मालूम कि माल रोड की चहलक़दमी क्या होती है ।हालाँकि कर्मचारियों का हुजूम सड़कों पर निकल टहलता हुआ नज़र आता है। टहलना क्या कहें थोड़ा सुकून के साथ बेचारे तफ़रीह कर लेते हैं । खुली हवा में सुकून की साँस लेते हैं, थोड़ा मन मन बहल जाता है । इस दृश्य को रोज़ाना देखते हुए अब हमने अपने इस सड़क का नाम बदल कर माल रोड रख दिया है । वजह बिल्कुल साफ है क्योंकि हमने देखा है कि लगभग हर पर्यटक स्थल पर एक माल रोड होता है जहाँ सभी लोग सैर सपाटा कर अपना समय बड़े ही सुकून के साथ तफ़रीह कर गुज़ारते हैं । हमारी इस सड़क पर भी लंच ब्रेक के दौरान कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई देता है ।
वैसे आमतौर पर हर शहर में जहाँ किसी एक जगह पर दो चार दफ़्तर होते हैं यह नज़ारा आम होता है । किसी ना किसी बहाने दफ़्तर में काम करने वाले लोग बाहर निकल थोड़ी चहलक़दमी कर लेते हैं, अन्यथा उनके पास वक़्त कहाँ । सुबह की ज़िम्मेदारियों भरी भागदौड़ और उसके बाद दफ़्तर समय पर पहुँचने की आपाधापी , कहाँ आपको चैन लेने देती है । शाम में दफ़्तर से निकलने के बाद फिर वही ज़िम्मेदारियों भरी बातें और घर पहुंचते ही बेचारे पर थकान हावी । करे तो क्या करे बेचारा बाबू ।
ध्यान रहे- कहीं नज़र न लग जाए।
मनीष वर्मा “मनु”
