जब संदेशों के साथ आता था इंतज़ार, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- बैरंग पत्र से टेलीग्राम तक की सुनहरी यादें
बैरंग पत्र
पुरानी यादें भी कहाँ पीछा छोड़ती हैं।न चाहते हुए भी गाहे – बगाहे आपके सामने आकर खड़ी हो जाती हैं ।उन्हीं यादों में से एक है “ बैरंग पत्र “ ।बैरंगपत्र वह पत्र होता था जिस पर भेजने वाले ने डाक

टिकट नहीं लगाया होता था।इस प्रकार के पत्र के डाक टिकट के शुल्क की वसूली जुर्माने के साथ, जो लगभग दोगुना होता था, इस पत्र के पानेवाले से वसूल किया जाता था । उस वक़्त डाकिया जब “ बैरंग पत्र “ लेकर घर पहुँचता था तो पत्र लेने से पहले यह सुनिश्चित करना होता था कि जेब में पैसे हैं भी या नहीं ? डिजिटल भुगतान का जमाना तो था नहीं !
ऐसा माना जाता है कि “ बैरंग “ शब्द शायद अंग्रेज़ी के शब्द “ बेयरिंग “ से जुड़ा हुआ है । बात चाहे जो भी हो आप इस ग़लतफ़हमी में बिल्कुल न रहें कि यह शब्द रंगों से जुड़ा हुआ है । रंगों से इसका दूर तक कोई लेना देना नहीं है । वैसे शब्द सुनने में जितना दिलचस्प है उससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प उससे जुड़ी हुई यादें हैं ।
हालाँकि आज के डिजिटल युग में इसकी प्रासंगिकता बिल्कुल भी नहीं रही । अब तो यह व्यवहार में भी नहीं है । आज की युवा पीढ़ी तो शायद इस शब्द को जानती भी नहीं है । उन लोगों को यह शब्द बखूबी मालूम होगा जिन्होंने अपनी ज़िंदगी के कम से कम चालीस से उपर के बसंत देख रखे हैं । हमारी पीढ़ी के लोगों के लिए बैरंग पत्र महज़ एक शब्द नहीं बल्कि फ़्लैशबैक की स्मृतियाँ हैं ।
जहाँ तक हम समझ सकते हैं- बैरंग पत्र भेजने के हालाँकि बहुत से कारण होते थे । आप जिस जगह पर हैं वहाँ डाक टिकट का नहीं मिलना और पत्र का भेजा जाना ज़रूरी है । दूसरा यह सुनिश्चित करना कि यह पत्र, पत्र पाने वाले को निश्चित तौर पर मिलेगा । ऐसी धारणा उस वक़्त लोगों में बनी हुई थी । मेरी माँ भी रक्षाबंधन के मौक़े पर अकसर अपने भाइयों को बैरंग राखी भेज दिया करती थीं । बैरंग राखी भेजने का उनका अभिप्राय किसी को परेशान करने का नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना होता था कि अब भाइयों को राखी ना मिले इस बात की संभावना बिल्कुल नहीं है । कभी-कभी तो लोग बाग अपने किसी बंधु को थोड़ा खींचने के लिए भी “ बैरंग पत्र भेज दिया करते थे । पानेवाला बेचारा क्या करे, उसे लेना ही पड़ता था । ना जाने अंदर का मज़मून क्या हो ? शायद कुछ महत्वपूर्ण और ज़रूरी मसला हो ।
वैसी ही एक पुरानी याद सामने आ रही है- टेलीग्राम @ तार । त्वरित संदेश भेजने के लिए आज की तरह कोई सोशल मीडिया तो नहीं होता था, तब संदेश भेजने के लिए टेलीग्राम @ तार ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था । शब्दों के मुताबिक़ पैसे लगते थे । शब्द चाहे छोटे हों या बड़े कोई फर्क नहीं पड़ता था । इसलिए लोग शब्दों का इस्तेमाल कम से कम करते थे और मायने ज़्यादा समझाते थे । चूँकि हर शब्द की एक क़ीमत होती थी इसलिए हर शब्द सोच समझकर लिखा जाता था ।
तारघर में लोगों की सुविधा के लिए विभिन्न प्रकार के संदेश भेजे जाने के लिए एक टेम्पलेट बना होता था । अब वह व्यवस्था भी बदलते समय की भेंट चढ़ गई । त्वरित संदेश भेजे जाने की ज़रूरत ही नहीं रही । अब तो पल पल के ख़बर पर सबकी निगाहें टिकी रहती हैं । अगर कोई ख़बर/ संदेश पाने में किसी वजह से थोड़ी देर हो गई तो ब्लड प्रेशर अचानक से उपर नीचे होने लगता है ।
बैरंग पत्र और टेलीग्राम @ तार दोनों ही अब हमारी ज़िंदगी के साथ नहीं हैं । हमारी ज़िंदगी के हिस्से नहीं हैं वे, पर हमारी स्मृतियों में वे आज भी सुरक्षित मौजूद हैं । वे केवल डाक व्यवस्था के पुराने तरीक़े नहीं बल्कि हमारे दौर की जीवन शैली, रिश्तों और संवाद की अपनी एक गाथा कहते हैं ।
पहले एक पत्र आने में दिन लगते थे, तार आने में भी समय लगता था, लेकिन शायद इंतज़ार में भी एक अलग तरह का आनंद था। आज संदेश सेकंडों में पहुँच जाता है, लेकिन उस संदेश के पीछे इंतज़ार, उत्सुकता और भावनाओं का वह संसार कहीं पीछे छूट गया है।
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
