सम्पादकीय

शून्य से शिखर तक का महानायक: कलम, क्रांति और कॉरपोरेट जगत का वह वटवृक्ष जो मौन हो गया

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

”अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू कहां खतम,
ये मंजिलें हैं कौन सी, ना वो समझ सके न हम…।”
आज जब रवीन्द्र किशोर सिन्हा (आर.के. सिन्हा) जी के महाप्रयाण की खबर आई, तो हिंदी सिनेमा के इस अमर गीत के बोल अनायास ही स्मृति पटल पर कौंध गए। यह गीत केवल धुन नहीं, बल्कि बाबूजी के उस संपूर्ण जीवन-चक्र का जीवंत दर्पण है, जिसकी शुरुआत अभावों की धूल से हुई थी और जिसका विस्तार वैश्विक फलक तक पहुंचा। एक साधारण से इंसान का असाधारण गाथा बन जाना क्या होता है, यह आर.के. सिन्हा के जीवन को देखकर समझा जा सकता है। आज जब वे अनंत यात्रा पर निकल चुके हैं, तो भारतीय राजनीति, पत्रकारिता, कला-संस्कृति और उद्योग जगत ने अपना एक ऐसा अभिभावक खो दिया है, जिसकी भरपाई असंभव है।

बक्सर के किराए के कमरे से बहियारा की माटी तक

आर.के. सिन्हा की संघर्ष-गाथा की जड़ें बिहार की ठेठ मिट्टी से जुड़ी थीं। उनका जन्म बक्सर में एक छोटे से किराए के मकान में हुआ था, जबकि उनका पैतृक गांव भोजपुर (आरा) जिले का ऐतिहासिक गांव ‘बहियारा’ है। वीर कुंवर सिंह की इस बागी और स्वाभिमानी भूमि के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को बचपन में ही गढ़ दिया था।
अल्पायु में ही पिता का साया सिर से उठ गया। घर में फाकेमस्ती और घोर आर्थिक संकट था। लेकिन सिन्हा जी ने कभी अभावों के आगे घुटने नहीं टेके। वे गर्व से कहते थे- “अभाव इंसान को तोड़ते नहीं, बल्कि सोने की तरह तपाकर कुंदन बनाते हैं।” अपने पैतृक गांव बहियारा और बक्सर की तंग गलियों की यादें उनके जीवन के आखिरी पड़ाव तक उनकी आंखों में तैरती रहीं।

पत्रकारिता का जुनून, जेपी की सीख और SIS की नींव

70-80 के दशक में आर.के. सिन्हा एक निष्पक्ष, निडर और बेबाक पत्रकार के रूप में उभरे। वे आजीवन भीतर से एक पत्रकार ही रहे। अरबों रुपये के व्यापारिक साम्राज्य के शीर्ष पर बैठने के बाद भी रोज सुबह आठ बजे अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर देश-दुनिया के ज्वलंत मुद्दों पर लेखनी चलाना उनकी दिनचर्या का अटूट हिस्सा था।
पत्रकारिता के दिनों में ही 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय वे ‘वार कॉरेस्पॉन्डेंट’ (युद्ध संवाददाता) के रूप में सीमा पर डटे रहे। वहां उन्होंने बिहार रेजिमेंट के वीर जवानों के साथ मोर्चे पर दिन बिताए। अनुशासन, त्याग और वर्दी का सम्मान उनके दिल में यहीं से गहरे पैठा।
इसके बाद जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का शंखनाद किया, तो सिन्हा जी व्यवस्था परिवर्तन की उस मशाल को लेकर अग्रिम पंक्ति में खड़े हो गए। जेपी आंदोलन में सक्रियता और क्रांतिकारी विचारों के कारण उन्हें अपनी पत्रकारिता की नौकरी गंवानी पड़ी।
बेरोजगार होकर जब वे लोकनायक जेपी के पास पहुंचे और अपनी व्यथा रखी, तो जेपी ने उन्हें एक ऐतिहासिक मंत्र दिया- “सिन्हा, कुछ ऐसा करो जिससे तुम्हें खुद तो रोजगार मिले ही, साथ ही तुम दूसरों के लिए भी रोजगार के दरवाजे खोल सको।”
जेपी का यह वाक्य उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया। युद्ध के दौरान देखे गए भूतपूर्व सैनिकों की दयनीय आर्थिक स्थिति और बिहार के बेरोजगार भटके नौजवानों का दर्द उनके जेहन में था। 1974 में मात्र ₹250 की पूंजी और एक छोटे से गैरेज से उन्होंने ‘सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज’ (SIS) की नींव रखी। शुरुआत में लोगों ने उपहास उड़ाया, तंज कसे कि पढ़ा-लिखा पत्रकार अब दरबान तैयार करेगा। लेकिन सिन्हा जी के पास एक विजन था—निजी सुरक्षा को गरिमा, अनुशासन और पेशेवर पहचान दिलाना। उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा इसमें झोंक दी और इतिहास रच दिया।

बिहार से निकलकर सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक परचम

किसी भी देश या समाज की रीढ़ उसका उद्योग और व्यापार होता है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक भारतीय व्यापार ने दुनिया को राह दिखाई है। बिहार जैसे राज्य में, जहां लोग प्रायः सुरक्षित नौकरियों या जीवन बसर की जुगत में ही उलझे रह जाते हैं, वहां से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी खड़ी करना किसी चमत्कार से कम नहीं था।
आर.के. सिन्हा के इस विजन को नई वैश्विक उड़ान तब मिली, जब उनके सुपुत्र ऋतुराज सिन्हा ने कमान संभाली। ऋतुराज जी ने अपने पिता के संघर्ष को वैश्विक प्रतिष्ठा में बदल दिया। उन्होंने एसआईएस को भारतीय शेयर बाजार (NSE/BSE) में लिस्ट कराया और भारत से बाहर निकलकर ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और न्यूजीलैंड तक इसका विस्तार किया।
सिन्हा साहब अक्सर गर्व से कहते थे कि एक पिता के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसका वह पुत्र है जो उसके अधूरे ख्वाबों को दुनिया के नक्शे पर साकार कर दे। आज जब एसआईएस लाखों परिवारों के चूल्हे जलाने का साधन बना है, तो यह आर.के. सिन्हा के उसी ₹250 के संकल्प की परिणति है।

राजनीतिक शुचिता और सांस्कृतिक अनुराग
आर.के. सिन्हा भारतीय जनसंघ के दौर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों से प्रेरित होकर राजनीति में आए। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के स्थापना काल से ही वे इसके समर्पित सिपाही रहे। सत्ता में रहे हों या विपक्ष में, वे हमेशा दल के निष्ठावान, मौन और कुशल रणनीतिकार बने रहे। राज्य सभा सांसद के रूप में उच्च सदन में उन्होंने हमेशा नीतिगत और तार्किक बहस को प्राथमिकता दी। वे राजनीति को व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम मानते थे।
राजनीति और उद्योग के साथ-साथ उनका साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्ष भी अत्यंत समृद्ध था। वे डुमरांव (बक्सर) स्थित ‘शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ट्रस्ट’ के मुख्य संरक्षक थे। भारतीय संगीत, लोक-कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए वे हमेशा तत्पर रहे। हमारी संस्था द्वारा उनके इस सांस्कृतिक अवदान को देखते हुए उन्हें ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया था, जिसे उन्होंने अत्यंत आत्मीयता से स्वीकारा था।

देहरादून के सात दिन: अनकहे पन्नों की वह अधूरी दास्तान

बाबूजी के जीवन के अनछुए पहलुओं को सबसे करीब से देखने का सौभाग्य मुझे मिला। उनकी दिली तमन्ना थी कि मैं उनकी संपूर्ण प्रामाणिक जीवनी लिखूं। इस उद्देश्य से वे वर्ष 2024 में मुझे पूरे एक सप्ताह के लिए अपने साथ देहरादून ले गए।
वे सात दिन स्मृतियों के अनमोल खजाने थे। शांत वादियों में रोज घंटों बैठकर उन्होंने अपने बचपन के अभाव, जेपी आंदोलन की तपिश, जेल की यातनाएं, व्यापारिक षड्यंत्र, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और जीवन के हर हर्ष-विषाद को पूरी ईमानदारी से मेरे सामने खोलकर रख दिया। मैंने पूरी लगन से उनकी उस महागाथा को शब्दों में ढाला और पांडुलिपि तैयार की। देश के वरिष्ठ एवं पद्मश्री से सम्मानित मूर्धन्य पत्रकार श्री रामबहादुर राय जी ने सहर्ष इसका प्राक्कथन लिखने का दायित्व लिया।
पांडुलिपि पूरी होने पर मैंने देहरादून में उन्हें एक-एक शब्द पढ़कर सुनाया था। वे बेहद भावुक हुए, मेरी पीठ थपथपाई और अपनी जीवन-यात्रा को उस रूप में देखकर अत्यंत संतुष्ट हुए। मगर होनी को कुछ और मंजूर था। कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों और व्यावहारिक विवशताओं के कारण पुस्तक के मुद्रण में थोड़ा विलंब हुआ। मन में यह टीस और कसक जीवन भर कांटे की तरह चुभती रहेगी कि मैं उस मुद्रित पुस्तक की पहली प्रति उनके जीवित रहते उनके हाथों में नहीं सौंप सका। काश, कुदरत ने उन्हें कुछ और मोहलत दी होती। लेकिन संतोष इस बात का है कि वे अपनी पूरी कहानी, अपनी संघर्ष-गाथा मेरे मुख से सुन चुके थे और उनका आशीर्वाद इस कृति के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया था।

एक युग का अवसान
आज जब आर.के. सिन्हा जी हमारे बीच नहीं हैं, तो ऐसा लगता है जैसे सिर से एक घना वटवृक्ष उठ गया हो। वे एक ऐसे पथ-प्रदर्शक थे जिन्होंने सिखाया कि अगर इरादों में सच्चाई हो, तो परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, सफलता कदम चूमती है।
यह जीवनी जब भी प्रकाशित होकर पाठकों के हाथों में पहुंचेगी, वह केवल कागज के पन्नों की एक किताब नहीं होगी, बल्कि उस महामानव, उस कर्मयोगी के चरणों में एक लेखक के आंसुओं, स्मृतियों और कृतज्ञता की सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सिन्हा जी, आप भले ही सशरीर विदा हो गए हों, लेकिन अपनी लेखनी, अपने विचारों और लाखों युवाओं के स्वाभिमान में आप सदैव अमर रहेंगे।

Leave a Reply