सम्पादकीय

सफलता, संवेदनशीलता और संघर्ष, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- क्या पद पर पहुँचकर भी इंसान बने रहना सबसे बड़ी चुनौती है ?

कप्तान साहब- पद, व्यक्तित्व और व्यावहारिक जीवन के बीच संतुलन की तलाश

कप्तान साहब इस शहर में नए-नए आए हैं। अभी-अभी तो उनकी ट्रेनिंग पूरी हुई है और यह उनकी पहली पोस्टिंग है। स्कूल-कॉलेज

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

की पढ़ाई से लेकर उच्चस्तरीय प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हासिल करने तक का उनका सफ़र इतना आसान भी नहीं रहा होगा। किसी मुक़ाम तक पहुँचने के लिए वर्षों की मेहनत, अनुशासन, त्याग और धैर्य की आवश्यकता होती है। लिहाज़ा, उनकी इस उपलब्धि को कम करके नहीं आँका जा सकता। लेकिन ज़िंदगी की असली शुरुआत तो अब हुई है। यूँ कहें कि अब जाकर उनका सामना उन चुनौतियों से होगा, जिनके लिए ट्रेनिंग ने उन्हें तैयार तो किया है, लेकिन जिनका वास्तविक स्वरूप केवल अनुभव से ही समझा जा सकता है।
व्यावहारिक जीवन की अपनी एक अलग चुनौतियाँ होती हैं,जहाँ हर क़दम पर आपका इम्तिहान लिया जाता है। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ कर पाना भी उतना आसान नहीं होता। ऐसे में आपके पास आपका पद, आपका व्यक्तित्व, आपकी समझ और आपका आत्मविश्वास ही होता है, जिनके सहारे आप आगे बढ़ते हैं और आने वाली चुनौतियों से दो-दो हाथ करने का साहस जुटाते हैं।
पढ़ाई में अव्वल होना एक बात है और जीवन की व्यावहारिकता को समझना तथा उसे कुशलतापूर्वक निभाना बिल्कुल दूसरी बात। यह आपके आपने विवेक और अनुभव से ही आता है। यह वह दौर होता है, जब आप भीड़ के बीच खड़े होकर भी अकेले होते हैं। आपके आसपास ऐसे लोग होते हैं, जो उम्र, अनुभव, परिस्थितियों और सोच के लिहाज़ से आपसे बिल्कुल अलग होते हैं। उनके साथ कदमताल करना, उनकी अपेक्षाओं को समझना और अपनी मान्यताओं पर अडिग रहते हुए उनके साथ संतुलन साधना किसी तलवार की धार पर चलने से कम नहीं होता।
कुछ लोगों को आप समझा नहीं सकते और कुछ लोगों को आप समझ नहीं सकते। कहीं आपकी बात को ग़लत समझ लिया जाता है, तो कहीं आपकी चुप्पी के कुछ और मायने निकाल लिए जाते हैं। कई बार आपकी नीयत से ज़्यादा आपके निर्णयों का मूल्यांकन होता है। बस, यहीं से शुरू होती है आपकी असली अग्निपरीक्षा। यदि आप परिस्थितियों को समझते हुए, अपने विवेक और धैर्य के साथ आगे बढ़ गए, तो वाह-वाह! लेकिन यदि किसी मोड़ पर संतुलन बिगड़ गया, कोई निर्णय ग़लत साबित हुआ या कोई बात आपकी प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा गई, तो उसका दाग़ मिटाने में बरसों लग सकते हैं। पद जितना बड़ा होता है, उससे जुड़ी अपेक्षाएँ और उत्तरदायित्व भी उतने ही बड़े होते जाते हैं।
प्रशिक्षण तो दरअसल एक खाका खींचता है। वह आपको नियमों, प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं से परिचित कराता है । परंतु वास्तविक जीवन में कब, कैसे और किस सीमा तक इसका उपयोग किया जाना चाहिए, इसका विवेक आपको स्वयं विकसित करना पड़ता है। व्यवस्था की बाहरी दुनिया आपको विरासत में मिल सकती है, लेकिन उसके भीतर अपनी पहचान बनानी पड़ती है। अपनी कार्यशैली, अपने व्यवहार और अपने निर्णयों से आपको वह दुनिया स्वयं गढ़नी होती है, जिसमें आप लंबे समय तक काम करने वाले हैं।
यहाँ एक और दिलचस्प बात सामने आती है। जिस मुक़ाम तक आप पहुँच चुके हैं, वहाँ तक पहुँचने की कोशिश में न जाने कितने लोग रास्ते में पीछे छूट गए। कितनों ने परिस्थितियों के सामने घुटने टेक दिए, कितने ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब गए और कितनों की प्रतिभा अवसरों के अभाव में दम तोड़ गई। जो लोग किसी तरह अपने संघर्षों के बीच आगे बढ़ते रहे, उनके पास भी शायद इतनी ऊर्जा शेष न हो कि वे आपकी गति से कदम मिला सकें। जहां से आपने आपने ब्यावहारिक जीवन की शुरुआत की है , कई तो वहाँ पहुचने से पहले ही दम तोड़ जाते हैं ऐसे में उनकी तुलना आपसे करना कहाँ तक उचित है?
यह तुलना वैसे कुछ-कुछ एकतरफ़ा मोहब्बत जैसी है। एक पक्ष अपनी भावनाओं और अपेक्षाओं के संसार में जी रहा है, जबकि दूसरा जीवन की वास्तविकताओं से जूझ रहा है। दोनों को शायद अपनी-अपनी सीमाओं का पूरा एहसास नहीं है।
एक ओर आप हैं, जिनके सामने इस समय जीवन की अनेक व्यावहारिक ज़िम्मेदारियाँ अपेक्षाकृत कम हैं। आपके पास अपने लक्ष्य निर्धारित करने, उन्हें हासिल करने और अपने भविष्य को आकार देने के लिए समय, ऊर्जा और अवसर हैं। दूसरी ओर वह व्यक्ति है, जिसका दिल और दिमाग़ हर वक़्त दाल-रोटी, परिवार, बच्चों की पढ़ाई, घर के ख़र्च और जीवन की दूसरी अनिवार्य ज़िम्मेदारियों के बीच कोई रास्ता तलाशता रहता है। उसके सपने भी होते हैं, इच्छाएँ भी और कुछ कर गुज़रने की तमन्ना भी; लेकिन हर सपना पूरा करने के लिए केवल इच्छाशक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। अवसर, साधन और परिस्थितियों का साथ भी ज़रूरी होता है।
सवाल यह है कि क्या वह व्यक्ति कभी अपने लिए वह रास्ता खोज पाता है? क्या उसे अपनी संभावनाओं को पहचानने और उन्हें साकार करने का अवसर मिल पाता है? या फिर ज़िंदगी की अनिवार्य ज़िम्मेदारियाँ ही धीरे-धीरे उसके सपनों की जगह ले लेती हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर हर व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग हो सकता है।
यहीं से जीवन को देखने का एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित होता है। सफलता केवल अपनी उपलब्धियों को गिनने का नाम नहीं है; यह उन परिस्थितियों को समझने का नाम भी है, जिनमें दूसरे लोग अपना जीवन जी रहे हैं। यदि किसी व्यक्ति को बेहतर अवसर मिले हैं, तो उसके पीछे उसकी मेहनत के साथ-साथ उसका सामाजिक परिवेश, परवरिश, उसकी परवरिश, उसकी शिक्षा और परिवार का सार्थक माहौल का बहुत बड़ा योगदान होता है । इसका मतलब यह नहीं कि उसकी अपनी उपलब्धि का महत्त्व कम हो जाता है, बल्कि यह कि वह अपनी सफलता को अधिक विनम्रता और व्यापकता के साथ देख पाता है।
ज़िंदगी की इन बेरहम सच्चाइयों के बीच संतुलन साधना ही सफलता की पहली सीढ़ी है। किसी ज़िम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति के लिए यह समझना ज़रूरी है कि अधिकार उसे निर्णय लेने की शक्ति तो देता है, लेकिन उन निर्णयों को मानवीय बनाने की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है।
किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण एक दिन में नहीं होता। उसका सामाजिक परिवेश, उसकी परवरिश, उसकी शिक्षा और सबसे बढ़कर उसके परिवार का माहौल, ये सभी मिलकर उसके भीतर की दुनिया बनाते हैं। यही दुनिया उसके निर्णयों, व्यवहार और मुश्किल समय में प्रतिक्रिया देने के तरीक़े को प्रभावित करती है। इन सबके बीच यदि कोई एक आधार भी कमज़ोर पड़ जाए, तो जीवन की नैया डगमगाने लगती है।
ज़िंदगी तब ऊँचाइयों पर उड़ते उस विमान की तरह हो जाती है, जो अचानक ऊंचाइयों पर टर्बुलेंस में फँस जाता है। विमान के भीतर बैठे यात्रियों को केवल झटके महसूस होते हैं, लेकिन पायलट को हर पल परिस्थितियों का आकलन करके विमान को सुरक्षित दिशा में ले जाना होता है। ऐसे समय में केवल ऊँचाई पर होना पर्याप्त नहीं होता; संतुलन, धैर्य, कौशल और सही निर्णय ही मायने रखते हैं।
जीवन भी कुछ ऐसा ही है। जब परिस्थितियाँ अनुकूल हों, तब आगे बढ़ना अपेक्षाकृत आसान होता है। असली परीक्षा तो तब होती है, जब परिस्थितियाँ आपके नियंत्रण से बाहर जाने लगें। ऐसे में यदि कोई कुशल खेवनहार मिल जाए, जो आपको सही दिशा दिखा सके, तो फिर क्या कहने! लेकिन यदि ऐसा कोई सहारा न मिले, तो व्यक्ति को अपने विवेक, अनुभव और धैर्य के सहारे ही अपनी नैया पार लगानी पड़ती है।
कप्तान साहब के सामने भी अब यही चुनौती है। उनके पास उपलब्धि है, पद है, ऊर्जा है और भविष्य की असीम संभावनाएँ हैं। अब देखना यह है कि वे इन सबका इस्तेमाल किस तरह करते हैं। क्या वे केवल व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह जाते हैं, या अपने आचरण से व्यवस्था में मानवीयता का स्पर्श भी जोड़ पाते हैं? क्या वे अपनी सफलता को केवल अपनी मेहनत का परिणाम मानते हैं, या उन अनगिनत लोगों के संघर्षों को भी समझने की कोशिश करते हैं, जिन्हें जीवन ने समान अवसर नहीं दिए ?
आख़िरकार, किसी पद की वास्तविक गरिमा केवल उसके अधिकारों में नहीं, बल्कि उन अधिकारों के इस्तेमाल में दिखाई देती है। और किसी व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई इस बात से नहीं आँकी जाती कि वह कितनी ऊँचाई तक पहुँच गया, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि ऊँचाई पर पहुँचकर भी वह ज़मीन से कितना जुड़ा हुआ है।
ज़िंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा मे सफल होने की नहीं बल्कि सफलता के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए इंसान बने रहने की है।

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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