सम्पादकीय

तरक्की के दौर में खोती मुस्कान, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- वर्तमान में जीना ही खुशी की कुंजी

खुश रहने का नुस्ख़ा

अहले सुबह जब आप सोकर उठते हैं , तो उसका अनुभव ही एक अलग अंदाज़ ए बयां करता है। आप थोड़े अलसाए हुए होते हैं , पर जैसे ही आपने बिस्तर छोड़ा एक अजीब सी स्फूर्ति आपके तन

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

मन और दिलो दिमाग़ पर छा जाती है। आप पार्क में या फिर वैसी जगह जाना पसंद करते हैं जहाँ लोगबाग सुबह की सैर पर जाते हैं। बदनसीब होते हैं वो लोग जिनके शहर में सुबह की सैर के लिए कोई मुफ़ीद जगह नहींहोती है। हम तो कहते हैं वैसे शहर में अब ज़िंदगी बाक़ी नहीं रही। शहर मुर्दा हो गया है।जो शहर सुबहउठता नहीं है उस शहर को मुर्दा नहीं तो और क्याकहेंगे?
खैर! जब हम टहलने वाली जगह पर पहुंचते है तो वहाँ कुछ लोग हमें व्यायाम करते , तो कुछ लोग योगा करते , तो कुछ लोग एक दूसरे से बातचीत करते सैर करते हुए नज़र आते हैं । मतलब सभी कुछ न कुछ करते नज़र आते हैं ।
वहाँ कुछ वैसे लोग भी आपको मिल जाएंगे जिन्हें देखकर आपको शायद इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि वो सैर के लिए ख़ुशी ख़ुशी नहीं बल्कि मजबूरीवश आए हुए हैं । राज रोगों ने उन्हें यहाँ तक पहुँचा दिया है वरना सुबह की नींद कौन ख़राब करना चाहता है। मुए डॉक्टर ने अलटीमेटम दे दिया है और साथ में कह भी दिया कि दवा तो हम देदेंगे पर आपका मुकम्मल इलाज तो खैर , सुबह सुबह की सैर है । जाड़ा हो, गर्मी हो या फिर बरसात हो , ज़िंदगी प्यारी है तो यह नियम नहीं टूटना चाहिए । अब डॉक्टर की बात जो हमारे लिए धरती पर भगवान स्वरूप हैं उनकी बात कैसे टाली जाए ।बेचारा मरता क्या न करता। मजबूर है ।
हम भी वैसे ही लोगों में शुमार हैं हालाँकि डॉक्टर ने मुझे ऐसा कुछ नहीं कहा है, पर बढ़ती हुई उम्र के साथ ही साथ इन्सान की जीने की जिजीविषा बढ़ती जाती है जबकि जो अटल सत्य है उस पर क्या टिप्पणी की जाए।
ख़ैर थोड़ी सी लेखनी इधर से उधर हो गई कहना कुछ और चाह रहा था पर लेखनी कब घूम गई पता ही नहीं चला ।बताना चाह रहा था लोग कितना ख़ुश है ।बाहर से तो ख़ुश नज़र आते हैं पर अंदर ख़ुशी नहीं है और वह कहीं न कहीं आपके चेहरे पर दिख जाता है ।
सभी ऐसा लगता है मानो- तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो क्या ग़म है जिसे तुम छुपा रहे हों के तर्ज़ पर जी रहे हैं।
सुबह सुबह जब आपका चेहरा बिलकुल खिलता हुआ दिखाई देना चाहिए । उस पर किसी तरह का कोई खिंचाव नज़र नहीं आना चाहिए , पर ऐसा लगता नहीं है ।आप यहाँ हो और आपका मन मस्तिष्क कहीं और है वो कुछ और ही सुन और बुन रहा है कालांतर में यही खिंचा खिंचा चेहरा आपके रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल हो जाता है ।पता नहीं ख़शी कहाँ ग़ायब हो जाती है ।जितना ही हम लोग तरक़्क़ी कर रहे हैं हमारी ख़ुशी हम से उतने ही दूर जा रही है ।
किसी बच्चे के चेहरों को देखें।तो आप शायद समझ पाए कि आपका चेहरा क्या बयां कर रहा है ।आप एक साथ बहुत से चेहरे के साथ जी रहे हैं।अब जब ख़ुद को नहीं पहचान पा रहे हैं तो बाक़ी लोग हमें कैसे पहचान सकते हैं।
हमें और आपको सभी को यह शिकायत रहती है लोगों से वो आपको पहचान ही नहीं पाए पर यह तो लाज़मी क्योंकि इतने सारे चेहरे के साथ हम और आप जी रहे हैं ,जब हम ख़ुद को नहीं पहचान पा रहे तो बाक़ी हमें कैसे पहचान पाएंगे।
हमें वर्तमान में जीना सीखना होगा बिल्कुल उस बच्चे की तरह जो भूत और भविष्य की चिंता छोड़ सिर्फ़ और सिर्फ़ वर्तमान में रहता है ।आपको प्रकृति से प्रतिद्वंदिता निभाना छोड़ना पड़ेगा । ज़िंदगी को सरल और सहज बनाएं । उसे ज़्यादा उलझन भरा न बनाएं । यह मान कर चलें कि हर समस्या का समाधान है, पर वक़्त लगता है। वक़्त की सत्ता को समझने की ज़रूरत है। कुछ चीज़ें सनातन काल से चली आ रही हैं और शाश्वत हैं उन्हें स्वीकार कर लें।

मनीष वर्मा “मनु”

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