“सब कुछ चलता है” से अनुशासन तक, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- यातायात व्यवस्था पर एक आत्ममंथन
🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
हम और वो
फ्रैंकफर्ट, जर्मनी की बात है। कहीं जाने के लिए हमने टैक्सी बुलाई। भारत से बाहर हम जहाँ भी गए एक बात हमने नोटिस किया है, टैक्सियों में आला दर्जे की गाड़ियाँ हुआ करती हैं।

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
बिल्कुल साफ़ सुथरी चमचमाती हुई। गाड़ी के अंदर में किसी तरह की कोई बदबू नहीं । धीमें धीमें संगीत बजता हुआ। क्या मजाल कि गाड़ी चलाते हुए ड्राइवर फोन पर व्यस्त हो। ड्राइवर भी आम तौर पर गाड़ियों से सामंजस्य बिठाता हुआ। मतलब साफ सुथरी वेशभूषा, व्यवहार में विनम्रता ।यह इस बात को भी दर्शाता है कि आप अपने काम से प्यार करते हैं। वैसे भी कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। जब आप अपने काम से ख़ुश होते हैं, संतुष्ट रहते हैं तो बहुत सारे नकारात्मक विचार तो वैसे ही ख़त्म हो जाते हैं।
खैर! टैक्सी, फ्रैंकफर्ट और ड्राइवर का ज़िक्र मैं यहाँ दूसरे संदर्भ में कर रहा हूँ ।
टैक्सी आने के बाद हम टैक्सी में पीछे की सीट पर बैठ गए। उबर की औपचारिकता पूरी होने के साथ ही ड्राइवर ने हमें कहाँ- आप सीट बेल्ट लगा लें। यह नियम तो खैर हमारे यहाँ भी है, पर हम व्यावहारिक तौर पर पालन नहीं करते हैं। ‘ सब कुछ चलता है ‘ इसी मानसिकता के साथ हम सभी चलते हैं। तो भाई हमने तत्काल सीट बेल्ट बाँध ली। अब हम हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। टैक्सी ड्राइवर पाकिस्तानी था। वहाँ हमने पाया टैक्सी ड्राइवर अमुमन पाकिस्तानी , अफ़ग़ानी और कुछ तो मुझे टर्की के भी मिले।
हमारा टैक्सी ड्राइवर, हमें भारत से आया हुआ जानकर बहुत ख़ुश हुआ और हमलोग आपस में बातचीत करने लगे । विदेश में कोई अपनी भाषा में बात करे, बहुत अच्छा लगता है । बाक़ी तो ओंठ सिले हुए होते हैं। सिर्फ़ और सिर्फ़ जहाँ ज़रूरत हो वहीं खुलता है। बातचीत के दौरान हमने ड्राइवर से पूछा- मान लो हम पीछे बैठ बेल्ट नहीं लगाते हैं तो क्या होगा ? ड्राइवर ने बड़े इत्मीनान से कहा- सर अगर पुलिस वाले ने रोका तो पेनल्टी ना तो मेरे और ना ही मेरे गाड़ी पर लगेगी। वो आप पर लगेगी जो चालीस यूरो होगी। भाई हमारे यहाँ तो चालान गाड़ियों का कटता है । ऐसे अगर जिसकी गलती हो उसका कटने लगे तो फिर बात ही क्या है ! अच्छी व्यवस्था है हमें भी अपने यहाँ स्वीकार कर लेना चाहिए । बेचारा ड्राइवर और गाड़ी तो कम से कम पुलिस वाले की कोपभाजन का शिकार नहीं होगी । जिसकी गलती वो समझे ।
सफ़र हमारा कोई एक घंटे का था । हमारी बातें चल रहीं थीं । लगभग एक घंटे का हमारा सफ़र था। पूरे रास्ते कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि कोई यातायात नियमों की अवहेलना कर रहा हो। सब कुछ व्यवस्थित और अनुशासित ढंग से चल रहा था। गाड़ियों में तो मानो हॉर्न का अस्तित्व ही नहीं था; प्रेशर हॉर्न की कल्पना तक नहीं की जा सकती।
सफ़र के दौरान हमारी सोच भी साथ-साथ चल रही थी । हमारे यहाँ तो हम बस पुलिस वालों के डंडे देखकर नियम अपनाते हैं। अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए कहाँ हम सीट बेल्ट और हेलमेट पहनते हैं । यातायात जागरूकता सप्ताह/ महीना मनाया जा रहा है और पुलिस बिचारी बच्चों की तरह आपको सिर्फ़ हेलमेट पहनने और सीट बेल्ट लगाने की सीख दे रही है । बाक़ी ट्रेफ़िक के नियमों को तो आप भूल ही जाएँ। अगर पुलिस प्रशासन सड़क पर ना हो तो क्यों सीट बेल्ट लगाना और हेलमेट पहनना। बंधन लगता है भाई ! और फिर ज़िंदगी भी आपकी मौक़े पर बंधन तोड़ कर निकल जाती है।
एक्सप्रेसवे पर या फिर राष्ट्रीय उच्च पथ पर जहाँ स्पीड लिमिट होती है वहाँ हम जैसे ही कैमरे के पास पहुंचते हैं हम अपनी गाड़ी की स्पीड धीमी कर लेते हैं । उसे लिमिट के नीचे ले आते हैं । हमें हमारी ज़िंदगी की चिंता नहीं है । हम तो बस हमारा चालान ना कट जाए बस इतना ही जानते हैं । अगर चालान का डर ना हो तो हम बड़े ही फ़ख़्र से बताएँ कि भैया हमने तो इतनी दूरी इतने समय में ही तय कर ली । आप तो ऐसा लगता है कि जैसे बैलगाड़ी चला रहे हो ।
मुझे लगता है कि इस तरह की यातायात सुरक्षा संबंधी शिक्षा बच्चों को उनकी पढ़ाई के दौरान विद्यालयों में ही आउटरीच के माध्यम से दी जानी चाहिए । ताकि वो नियमों का पालन सिर्फ चालान से बचने के लिए ना करके उसे शिद्दत के साथ अपनी ज़िंदगी में शामिल करें । आपकी लापरवाही आपके साथ ही साथ दूसरों के लिए भी घातक हो रही है। आए दिन नाबालिगों के ग़लत तरीक़े से वाहन चलाने की घटनाएँ अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बन रही हैं । अपनी ज़िंदगी के साथ ही साथ दूसरों की ज़िंदगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं । अभिभावक भी इस बात के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं हैं । वो अपनी ज़िम्मेदारियों से मुकर नहीं सकते हैं। बच्चों से प्यार करें, पर इतना ध्यान ज़रूर रखें कि वो संवैधानिक नियमों का पालन करें । सरकार ने तो लक्षमण रेखा खींच दी है उसे नहीं लाँघना है इस बात की जानकारी और ज़िम्मेदारी होनी चाहिये ।
कुछ ज़िम्मेदारियाँ परिवार और समाज की भी होती है। हर काम सरकार नहीं कर सकती है। हमें इस बात को समझना होगा।
