सम्पादकीय

मंदिर में भगवान, बाहर ख़ामोश बुज़ुर्ग, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- क्या हमारी संवेदनाएँ मर रही हैं ?

मंदिर के सामने बैठा वह बुज़ुर्ग

रोज़ाना मैं उस मंदिर के सामने से गुज़रता हूँ । गली के एक मुहाने पर मंदिर है और दूसरे मुहाने पर मेरा आवास। मेरे दफ़्तर जाने और

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

आने का रास्ता एक ही है।
मंदिर में तमाम देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगी हुई हैं ।आपकी जैसी श्रद्धा—आप जहाँ मत्था टेकना चाहें, आपकी मर्ज़ी। चाहें तो सबके सामने जाकर अपना मत्था टेकें। इसमें बुराई भी क्या है? न जाने कब किसे आपकी कौन-सी बात बुरी लग जाए! आप उनके कोपभाजन के शिकार बन जाएं ।
मुझे अपने बचपन के दिन याद आते हैं। शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, दुर्गा मंदिर—ऐसे कितने ही मंदिरों की तस्वीरें आज भी ज़ेहन में बसी हुई हैं। तब हर मंदिर किसी एक भगवान को समर्पित मंदिर हुआ करता था।
छोटे शहरों में रहे हैं हम—जिन्हें आजकल टीयर-टू शहर कहा जाता है। वहाँ की अपनी एक अलग ही पहचान, एक अलग संस्कृति, एक अलग ही दुनिया थी। किराना मंडी, लोहा मंडी, सुनार पट्टी या सुनारों की मंडी, बजाजा यानी कपड़ों की मंडी। तमाम तरह की मंडियाँ होती थीं। अमुक वस्तु के लिए अमुक मंडी या बाज़ार। किराने की दुकान अलग तो उससे अलग पंसारी की दुकान।
डिपार्टमेंट स्टोर की संस्कृति तो बिल्कुल नई-नई है, जहाँ एक ही छत के नीचे लगभग सब कुछ मिल जाता है ।
भाई साहब, हमारे समय में अगर हमें पूजा-पाठ का सामान लेना होता था तो उसके लिए नियत दुकानें होती थीं। आज तो उसी डिपार्टमेंट स्टोर से पूजा-पाठ का सामान और खाने-पीने की शाकाहारी-मांसाहारी चीज़ें तक एक साथ ख़रीद लेते हैं। इस डिपार्टमेंट स्टोर वाली संस्कृति ने किसी को भी नहीं बख़्शा है।
ख़ैर! मनु अपनी आदत से मजबूर फिर भटक गया।
दरअसल, हम बातें कर रहे थे उस मंदिर की, जो गली के एक मुहाने पर है और दूसरे मुहाने पर मेरा घर हुआ करता है।
एक बुज़ुर्ग व्यक्ति, जिसकी उम्र लगभग पचहत्तर से अस्सी वर्ष के बीच होगी, आपको सुबह से लेकर रात तक वहीं मंदिर के सामने, सड़क के दूसरी ओर बैठा हुआ मिलता है। जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात—हर मौसम से बेफ़िक्र।
किसी ने कुछ पैसे दिए तो रख लिए। किसी से कुछ माँगना नहीं। किसी ने खाने के लिए कुछ दे दिया तो खा लिया।
उसे लेकर मेरे मन में हमेशा एक उत्सुकता बनी रहती थी।
कमर से थोड़ा नीचे, लेकिन घुटनों के ऊपर तक पहनी हुई एक गंदी-सी धोती। उसके ऊपर क़मीज़। आँखों पर काले रंग का चश्मा, जिसे दो-तीन जगहों पर मोटे धागे से बाँधकर किसी तरह काम चलाने लायक बनाया गया है। पता नहीं, उन आँखों से उसे साफ़ दिखाई भी देता होगा या नहीं।
आँखों में एक अजीब-सी ख़ामोशी है। उदासी भी नहीं कह सकते । शायद उन आँखों ने ख़ामोश रहना सीख लिया है।
ऐसा लगता है मानो आँखों ने कुछ देखना ही छोड़ दिया हो।
हर दिन आते-जाते मेरी नज़र न चाहते हुए भी उस पर टिक ही जाती है। दोपहर में मैंने उसे कई बार देखा है। जब धूप उसकी तरफ़ आती है तो वह मंदिर वाली तरफ़ जाकर बैठ जाता है। वर्षा होने पर भी मैंने उसे कहीं जाते हुए नहीं देखा। प्लास्टिक ओढ़कर वह वहीं बैठा रहता है।
जैसा कि मैंने पहले ही बताया, उस मंदिर वाली गली के एक मुहाने पर मेरा घर है।
एक बार मैं अपने घर की बालकनी में खड़ा था। रात के लगभग साढ़े नौ बजे का वक़्त रहा होगा। मैंने देखा, उस बुज़ुर्ग को कोई एक व्यक्ति—संभवतः उसका अपना ही कोई—अपने साथ लेकर जा रहा था।
उस व्यक्ति के हाथ में एक डंडा था। डंडे का एक सिरा उस बुज़ुर्ग के हाथ में था और दूसरा सिरा उस व्यक्ति के हाथ में।
दो-तीन दिन मैंने उसे इसी तरह जाते हुए देखा।
बड़ी तकलीफ़ हुई मुझे। उस व्यक्ति को उसका
‘बेटा’ कहते हुए मुझे संकोच भी हो रहा है और तकलीफ़ भी। कोई बेटा अपने बाप को कम से कम सुबह लाकर मंदिर के सामने छोड़ जाए और फिर रात में आकर उसे ले जाए—ऐसा सोचने के लिए भी मेरा दिल गवारा नहीं कर रहा ।
लेकिन अगर ऐसा नहीं है, तो फिर वह कौन है?
और अगर वह उसका अपना है, तो यह कैसी मजबूरी है?
इस उम्र में भी वह बुज़ुर्ग व्यक्ति दिन भर वहाँ बैठकर कुछ न कुछ कमा रहा है और शायद वही कमाई घर ले जा रहा है।
और मन में एक सवाल बार-बार उठता है—क्या उसके घर परिवार के लोग उसकी कमाई खा रहे हैं?
परिवार, समाज, रिश्ते-नाते—क्या सभी पर कोई ग्रहण लग गया है?
या फिर हमारी संवेदनाएँ धीरे-धीरे मर सी गई हैं?
मैं जब भी उस मंदिर के सामने से गुज़रता हूँ, मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ-साथ मेरी नज़र अनायास ही उस बुज़ुर्ग पर भी चली जाती है।
वह चुपचाप बैठा रहता है।
न किसी से कोई गिला और ना ही कोई शिकायत।
न किसी से किसी तरह की माँग।
न किसी से कोई सवाल।
बस अपनी ख़ामोशी के साथ वो चुपचाप बैठा रहता है ।
यही सोचता हुआ मेरा मन खिन्न सा हो जाता है और मैं आगे बढ़ जाता हूँ—लेकिन वह बुज़ुर्ग जाने क्यों मेरे भीतर वहीं बैठा रह जाता है।
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘

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