सम्पादकीय

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ब्रांड का दीवाना है ये नया मध्यम वर्ग, रविवारीय में आज पढ़िए- ब्रांड वैल्यू

चलिए आज़ रविवारीय चिन्तन में हम अर्थ पर चिन्तन करते हैं। कुछ मनन करते हैं, कुछ जानने की कोशिश करते

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सम्पादकीय

क्यों संदिग्ध है अकादमी पुरस्कारों की वार्षिक गतिविधियां ?

आखिर क्यों सही से काम नहीं कर पा रही साहित्य अकादमियां? पिछले दशकों में पुरस्कारों की बंदर बांट कथित साहित्यकारों,

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सम्पादकीय

राजनीतिक हस्तक्षेप से त्रस्त शिक्षा संस्थान

विश्वविद्यालय शैक्षणिक सुधारों के बजाय राजनीतिक हितों के पोषण का केंद्र न बनने पाएं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति

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सम्पादकीय

जब पंकज उदास से नाराज हो गए थें राजेंद्र कुमार, पंकज उदास के जन्मदिन पर विशेष

“तुम्हारा भाई बदतमीज़ है। उसे ज़रा भी तमीज़ नहीं है। उसके अंदर कोई एटिकेट्स नहीं हैं।” ये बात राजेंद्र कुमार

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सम्पादकीय

बिना स्वतंत्र मीडिया के स्वस्थ लोकतंत्र को सुनिश्चित कर पाना संभव नहीं

राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते राजनेताओं और मीडिया घरानों के बीच सांठगांठ के परिणामस्वरूप अक्सर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग होती है और असहमति

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