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डिजिटल पत्रकारिता में आर्थिक आत्मनिर्भरता का बढ़ता प्रभाव : प्रो. (डॉ.) तपन कुमार शांडिल्य

पटना। टी.पी.एस. कॉलेज, पटना में “डिजिटल युग में पत्रकारिता का अर्थशास्त्र : नैतिक मूल्यों और बाजारगत दबावों के बीच संतुलन” विषय पर एक महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रो. (डॉ.) तपन कुमार शांडिल्य ने की। मुख्य वक्ता प्रो. अरुण कुमार भगत, अध्यक्ष, मीडिया अध्ययन विभाग, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी एवं पूर्व सदस्य, बिहार लोक सेवा आयोग थे।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. (डॉ.) तपन कुमार शांडिल्य ने कहा कि डिजिटल युग में पत्रकारिता केवल समाचार प्रसारित करने का माध्यम नहीं, बल्कि तकनीक, अर्थव्यवस्था, बाजार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण संस्था है। डिजिटल पत्रकारिता को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए तकनीक, मानव संसाधन और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निरंतर निवेश आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आर्थिक आत्मनिर्भरता जरूरी है, लेकिन बाजार के दबाव में पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों और संपादकीय स्वतंत्रता से समझौता नहीं होना चाहिए। क्लिक और व्यू पत्रकारिता की आर्थिक आवश्यकता हो सकते हैं, लेकिन उसकी सबसे बड़ी पूंजी विश्वास और विश्वसनीयता है।

महात्मा गांधी के पत्रकारिता संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य, सेवा और जन-जागरण होना चाहिए। आज फेक न्यूज, डीपफेक और भ्रामक सूचनाओं के दौर में पत्रकारों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता में गति आवश्यक है, लेकिन गति से अधिक महत्वपूर्ण विश्वसनीयता है। इसलिए पत्रकारिता का मूल मंत्र होना चाहिए—“पहले सत्य, फिर गति।”

मुख्य वक्ता प्रो. अरुण कुमार भगत ने कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के पारंपरिक स्वरूप और उसके आर्थिक मॉडल को व्यापक रूप से बदल दिया है। डिजिटल पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी तत्कालता और व्यापक पहुंच है, लेकिन खबर को सबसे पहले देने की प्रतिस्पर्धा में तथ्य-जांच और संपादकीय विवेक की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया के आर्थिक मॉडल में विज्ञापन, सब्सक्रिप्शन, प्रायोजित सामग्री और अन्य स्रोतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बाजार से संसाधन प्राप्त करना गलत नहीं है, लेकिन बाजार का दबाव यदि समाचार के चयन और संपादकीय निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तो पत्रकारिता के मूल उद्देश्य पर प्रश्न खड़ा होता है। उन्होंने संपादकीय स्वतंत्रता, तथ्य-जांच और जिम्मेदार पत्रकारिता को लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक बताया।

प्रो. भगत ने कहा कि डिजिटल युग में पत्रकारिता का भविष्य केवल तकनीकी विकास में नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, तथ्यपरकता और नैतिक प्रतिबद्धता में निहित है। पत्रकारिता को बदलती तकनीक के साथ कदम मिलाकर चलना होगा, लेकिन अपने मूल मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहिए।

विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. अश्विनी कुमार, सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग ने कहा कि पत्रकारिता को केवल समाचार प्रकाशित करने की प्रक्रिया मानना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना होगा। पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका अर्थशास्त्र भी है। उन्होंने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता में आर्थिक आत्मनिर्भरता आवश्यक है, लेकिन सत्य, विश्वसनीयता और जनहित से समझौता नहीं किया जा सकता।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. ओंकार पासवान, सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग ने किया, जबकि कार्यक्रम संयोजक एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शशि भूषण चौधरी, विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग ने किया।

इस अवसर पर आईक्यूएसी समन्वयक प्रो. रूपम, प्रो. हेमलता सिंह, प्रो. ऊषा किरण, डॉ. प्रशांत कुमार, डॉ. अमृतांशु कुमार, डॉ. देवारती घोष, डॉ. चंद्रशेखर ठाकुर, डॉ. शशि शेखर कुमार सिंह, डॉ. हंस कुमार, डॉ. सुनीता कुमारी, श्री कुमार अमिताभ, श्री तुमुल आनंद, डॉ. अंकित तिवारी एवं शिवम पराशर सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी, शिक्षकेतर कर्मचारी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता को आर्थिक रूप से सशक्त और तकनीकी रूप से आधुनिक बनाने के साथ-साथ सत्य, विश्वसनीयता, संपादकीय स्वतंत्रता और जनहित को उसकी मूल पहचान बनाए रखना आवश्यक है।

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