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साहित्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सक्रिय श्रीनाथ सिंह बौद्ध ने 200 से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन को दिया सहयोग

पटना : बिहार के प्रख्यात साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बौद्ध विचारधारा से जुड़े श्रीनाथ सिंह बौद्ध (मौर्यवंशी) ने अपने लेखन, सामाजिक योगदान और बौद्ध दर्शन के प्रचार-प्रसार के माध्यम से एक विशिष्ट पहचान बनाई है। वे न केवल साहित्य जगत में सक्रिय हैं, बल्कि सामाजिक आंदोलनों और बौद्ध संगठनों के विकास में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

रोहतास जिले के नासरीगंज थाना क्षेत्र के पोखराहा गांव में 15 अगस्त 1958 को जन्मे श्रीनाथ सिंह बौद्ध का बचपन सांस्कृतिक और ग्रामीण परिवेश में बीता। उनके परिवार में शिक्षा और कृषि दोनों का गहरा प्रभाव रहा। उनके दादा रामवरण सिंह द्वारा स्थापित प्राथमिक विद्यालय से उनकी प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत हुई।

उनके पिता सीताराम सिंह उच्च शिक्षित होने के बावजूद कृषि कार्य में नवाचार करते रहे और इलाहाबाद में कृषि विस्तार के लिए भूमि विकास जैसे प्रयोगों से जुड़े रहे। इसी दौरान परिवार के साथ श्रीनाथ सिंह बौद्ध 1965 में इलाहाबाद पहुंचे, जहां उनके व्यक्तित्व और शिक्षा का विस्तार हुआ।

उन्होंने 1972 में वी.पी. सिंह के गोपाल विद्यालय इंटर कॉलेज से हाई स्कूल और 1974 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी दौरान 1974 में जेपी आंदोलन का प्रभाव भी उनके जीवन पर पड़ा। मिंटो पार्क में जयप्रकाश नारायण के भाषण के दौरान वे भी छात्रों के साथ आंदोलन में शामिल हुए, जिसने उनके सामाजिक और वैचारिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया।

श्रीनाथ सिंह बौद्ध का साहित्यिक सफर बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था। प्राकृतिक वातावरण में परवरिश होने के कारण उन्हें जंगल, पशु-पक्षी और ग्रामीण जीवन को नजदीक से देखने का अवसर मिला, जिसने उनकी लेखनी को समृद्ध बनाया। उनकी प्रारंभिक रचनाएं छद्म नामों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं, लेकिन उनकी शैली धीरे-धीरे पहचान बनाती गई।

स्कूली जीवन में भी वे सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे और प्रयागराज के स्थानीय समाचार पत्रों में उनकी कविताएं एवं कहानियां प्रकाशित होती रहीं। बचपन में ही उन्हें हेमवती नंदन बहुगुणा और वी.पी. सिंह जैसे नेताओं का सानिध्य प्राप्त हुआ, जो उनके पारिवारिक कृषि फार्म पर आगमन करते थे।

राजनीतिक दृष्टि से उनका जुड़ाव विभिन्न दलों से रहा, जिसमें कांग्रेस, जनता दल और समता पार्टी शामिल हैं, लेकिन उन्होंने हमेशा साहित्य और सामाजिक कार्य को प्राथमिकता दी। वर्ष 2005 में वे नोखा विधानसभा क्षेत्र से समता पार्टी के प्रत्याशी भी रहे, जिसके बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बना ली।

इसके बाद उन्होंने सामाजिक और बौद्ध संगठनों के साथ सक्रिय रूप से कार्य करना शुरू किया। वे समता सैनिक दल से जुड़े और 2006 में पटना में इसके प्रथम प्रांतीय सम्मेलन का आयोजन कराया। वर्ष 2007 में उन्हें संगठन का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और वर्तमान में वे राष्ट्रीय महासचिव के पद पर कार्यरत हैं।

उनके नेतृत्व में संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और इसे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ, जिसमें बिहार की भूमिका उल्लेखनीय रही।

वे “दी बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया” से भी जुड़े रहे और 2007 में इसके प्रांतीय अध्यक्ष बनाए गए। नागपुर में आयोजित दीक्षा समारोह के दौरान उन्हें बौद्ध और अशोक दर्शन के अध्ययन की प्रेरणा मिली, जिसके बाद उन्होंने सम्राट अशोक की नीतियों और बौद्ध दर्शन के प्रचार को अपने कार्य का प्रमुख हिस्सा बना लिया।

वर्ष 2009 में उन्होंने पटना के विद्यापति भवन से सम्राट अशोक जयंती समारोह की शुरुआत की, जो आज राज्य से लेकर देश के कई हिस्सों में मनाई जाती है। उनके प्रयासों से यह आयोजन गांव स्तर तक पहुंच चुका है और लोगों में सम्राट अशोक के इतिहास के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

वे मानते हैं कि समाज में शांति, मैत्री, भाईचारा और सहिष्णुता ही सशक्त राष्ट्र की नींव हैं। उनके अनुसार सम्राट अशोक के शासन मॉडल से आधुनिक भारत को प्रेरणा लेनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने बिना भेदभाव और भय के अखंड भारत का शासन किया था।

वर्तमान में श्रीनाथ सिंह बौद्ध “दी बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया” के ट्रस्टी एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं और सामाजिक एकता, बौद्ध दर्शन तथा सांस्कृतिक चेतना के विस्तार में लगातार सक्रिय हैं। वर्तमान में वो विजय ध्वज पत्रिका के सम्पादक है!

उनकी साहित्यिक और सामाजिक यात्रा यह दर्शाती है कि उन्होंने अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज, संस्कृति और विचारधारा के व्यापक उत्थान के लिए समर्पित किया है।

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