कैंसल हुई ट्रेन, माइनस तापमान और अनजान देश, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- ऐसे पूरी हुई मेरी स्विट्जरलैंड यात्रा
मेरी स्विट्जरलैंड यात्रा की वो रात
चलिए आज हम आपको एक छोटी सी घटना जो मेरे साथ जर्मनी से स्विट्जरलैंड जाते हुए हुई थी उसके बारे में बताता हूँ । इस घटना के मूल में मेरा जर्मन भाषा नहीं जानना एक कारण बना । वैसे भी एक व्यक्ति भला कितने भाषाओं में अपनी पकड़ बना

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
सकता है । किसी से कुछ पूछना हो तो चलो गुगल बाबा से मदद ली जा सकती है । कहीं कुछ लिखा हो तो भी गुगल बाबा की मदद से मुश्किल आसान की जा सकती है, पर उसका क्या करें जो एनाउंस हो रहा हो ! अंदाज़ा लगाना भी लगभग नामुमकिन ।
खैर ! चलिए आगे की बात करते हैं । स्टटगार्ट से मुझे भाया ज़्यूरिख़ Lucern जाना था । मुझे ज़्यूरिख़ वाली ट्रेन को Bobliengen से ही पकड़ना था, क्योंकि हम वहीं ठहरे हुए थे,पर हमने रिस्क लेना उचित नहीं समझा । परदेश का सवाल था । कुछ इधर उधर हो जाता तो मुश्किलें आ सकती थीं । तो हमने सोचा चलो कुछ समय ही तो जाया होगा, चलो स्टटगार्ट से जहाँ से ट्रेन खुलती है वहीं से पकड़ लेंगे । मेरी एक अच्छी या बुरी कहें एक आदत है , मैं जहाँ तक संभव हो सके रिस्क avoid करता हूँ ।
चलिए हमने स्टटगार्ट से ज़्यूरिख़ तक की ट्रेन पकड़ी । साथ में हमारी धर्मपत्नी भी थीं । ज़्यूरिख़ से हमें ट्रेन बदलनी थी जो हमें Lucern तक ले जाती । आप समझ सकते हैं कि स्विट्जरलैंड जाने का रोमांच और उत्सुकता कितनी हावी थी हमारे उपर । आख़िर क्यों ना हो हमारा सपना जो पूरा होने वाला था ।
ट्रेन खुली और हम बाहर के मनभावन दृश्यों को देखते हुए रोमांचित हो रहे थे । अंदर के टी वी स्क्रीन पर ट्रेन की औसत रफ़्तार लगभग ढाई सौ किलोमीटर प्रति घंटा थी, पर क्या मजाल कि सीट के सामने की टेबल पर रखे काफ़ी के प्याले में थोड़ा सा भी कंपन हो ।
धीरे-धीरे अब शाम हो चली थी । अब हम अपनी नज़रें बाहर से हटाकर स्विट्जरलैंड के बारे में बातें कर रहे थे । कैसा होगा स्विट्जरलैंड- हमारे सपनों का देश । तभी ट्रेन शिनजेन नाम के एक स्टेशन पर रूकती है । बाहर प्लेटफ़ॉर्म पर बड़ी भीड़ थी । हम बाहर प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े स्कूली बच्चों और उनकी कारस्तानियों पर बातें कर रहे थे । हमें इस दौरान अहसास ही नहीं हुआ कि ट्रेन वहाँ बहुत देर तक खड़ी रही है । कुछ एनाउंसमेंट भी हो रहा था, पर जर्मन भाषा ना जानने की वजह से समझ नहीं पाए । अचानक से हमने महसूस किया कि ट्रेन तो बिल्कुल ख़ाली हो चुकी है । हम बिल्कुल घबरा गए । पराया देश, शाम के साढ़े सात बज रहे थे । स्टाफ़ से हमने वजह जानने की कोशिश की । उसने बताया कि यह ट्रेन अब आगे नहीं जाएगी । इसे कैंसल कर दिया गया है । हम अपने डब्बे से बाहर आए और कोशिश किए कि स्टेशन पर कोई तो हमें कुछ जानकारी दे । प्लेटफ़ॉर्म पर कोई नहीं था जो हमें जानकारी दे सके । हमें तो अपने यहाँ की आदत थी कि स्टेशन पर कोई न कोई ज़रूर होता है जो आपको जानकारी मुहैया कराता है, पर वहाँ तो सारी की सारी व्यवस्था आनलाइन । जो कुछ देखना और समझना हो आप आनलाइन देखें और समझें । पुलिस वाले को हमने अपनी समस्या बताई, पर वही भाषा की दीवार । स्टेशन से बाहर निकल हमने सोचा कि चलो कोई बस पकड़ते हैं, पर कोई बस ज़्यूरिख़ तक नहीं जाती थी । रात के साथ ही साथ ठंड भी बढ़ रही थी । तापमान लगभग माइनस पर पहुंच चुका था । अब हमारे सामने रात बिताने की समस्या थी ।
खैर ! किसी तरह से पता चला कि यहाँ से एक ट्रेन शफाउजेन तक जाएगी जहाँ से आप दूसरी ट्रेन पकड़ कर ज़्यूरिख़ पहुँच सकेंगे । अब हम उस शफाउजेन वाली ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे । अपने स्विस घड़ियों के लिए मशहूर शहर शफाउजेन ।ठंडी हवा बिल्कुल हाड़ कंपा रही थी । तभी मेरे सामने खड़े युवक ने मुझे बताया कि आप यहाँ से निकल कर सामने वाले प्लेटफ़ॉर्म पर जाएं वहाँ जो ट्रेन आ रही है वो ज़्यूरिख़ जाएगी । भागते हुए क्या कहें , सामान उठा कर लगभग दौड़ते हुए हम दोनों प्राणी उस प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचे । ट्रेन आ चुकी थी । हमने सामान सहित अपने आप को अंदर किया । ट्रेन खुल चुकी थी । भागते हुए ट्रेन पकड़ने की वजह से साँसें हमारी धौंकनी की तरह चल रही थी । उसे सामान्य करने की हमारी क़वायद जारी थी, तभी टी टी महाशय के क़दम हमारे डब्बे में पड़े । अब हमें इस बात की घबराहट होने लगी कि टिकट और रिजर्वेशन तो हमारा किसी और ट्रेन का था । पता नहीं अब क्या हो ? हमें तो अपने यहाँ की आदत थी जहाँ ऐसे वक़्त में आप टी टी साहब की दया दृष्टि पर होते हैं ।हमारी घबराहट थोड़ी कम हुई जब टी टी ने हमसे टिकट मांगा और अंग्रेज़ी में बात की । बड़े इत्मीनान से मुस्कुराते हुए उसने कहा आप यहाँ से ज़्यूरिख़ पहुँच कर फ़लाने प्लेटफ़ॉर्म पर जाकर फ़लाँ नंबर की ट्रेन जो इतने बजे आएगी उसे पकड़ कर Lucern पहुँच जाएँगे ।
खैर । रात के लगभग बारह बजे हम Lucern पहुँचे । ठंढ माइनस तीन डिग्री । बहुत कुछ पहनने के बावजूद कुछ नहीं पहनने जैसा अहसास । दिसंबर का महीना चल रहा था । ऐसा लग कि पूरा शहर क्रिसमस की तैयारी में डूबा हुआ था। स्टेशन से हमारा होटल कोई आठ सौ मीटर की दूरी पर था। गुगल बाबा की मदद से पैदल चलते हुए हम अपने होटल तक पहुँचे। तो इस तरह से मुकम्मल हुई जर्मनी से स्विट्जरलैंड की हमारी यात्रा।
मनीष वर्मा “मनु”
