रविवारीय- अगले जन्म में मनुष्य नहीं, विदेशी नस्ल का कुत्ता बनना चाहता है मनु! आखिर क्यों ?
अगले जन्म में मनुष्य नहीं, विदेशी नस्ल का कुत्ता बनना चाहता है मनु!
ऐसा माना जाता है कि मनुष्य को पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेने का अवसर 84 लाख योनियों में भटकने के बाद ही प्राप्त होता है।

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
सनातन धर्म और हिंदू पौराणिक ग्रंथों, यथा पद्म पुराण, में 84 लाख योनियों की अवधारणा का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार, इस धरती पर पाए जाने वाले जीवों के 84 लाख प्रकार के शरीरों अथवा प्रजातियों की कल्पना की गई है। ऐसी मान्यता है कि जीवात्मा विभिन्न योनियों में जन्म लेती हुई अपनी यात्रा पूरी करती है और अंततः उसे मनुष्य योनि प्राप्त होती है।
हालाँकि, इस मान्यता के वैज्ञानिक आधार के संबंध में पक्के तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है, लेकिन सनातन धर्म, पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं में इसका उल्लेख लंबे समय से होता रहा है। यह विषय आस्था, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ा है, इसलिए इसे लेकर अलग-अलग विचारधाराएँ और मान्यताएँ होना स्वाभाविक है। कहीं-कहीं इस विषय पर परस्पर विरोधाभासी विचार भी देखने को मिलते हैं।
एक अन्य धारणा यह भी है कि यदि मृत्यु के समय मनुष्य के मन में कोई गहरी इच्छा, आसक्ति या अधूरा काम शेष रह जाता है, तो जीवात्मा उस इच्छा को पूरा करने अथवा अधूरे कार्य की पूर्ति के लिए पुनः शरीर धारण करती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, मनुष्य की इच्छाएँ, मोह, आसक्तियाँ और अधूरी कामनाएँ उसे इस नश्वर संसार से बाँधे रखती हैं। इस प्रकार पुनर्जन्म को केवल एक नए जीवन की शुरुआत नहीं, बल्कि पूर्वजन्म की इच्छाओं और कर्मों से जुड़ी एक निरंतर यात्रा के रूप में भी देखा जाता है।
दूसरी ओर, कुछ लोग मृत्यु के बाद 84 लाख योनियों में भटकने और पुनर्जन्म की अवधारणा को ही स्वीकार नहीं करते। प्राचीन आजीवक संप्रदाय का दर्शन नियतिवाद के लिए जाना जाता है। उसके अनुसार, जीव का जीवन और उसकी नियति पूर्वनिर्धारित है; व्यक्ति के प्रयासों की भूमिका को वह अन्य दर्शनों से बिल्कुल अलग ढंग से देखता है। वह प्रारब्ध को मानता है । जो होना है वह होकर रहेगा ।
खैर! आध्यात्मिक दर्शन की इन गूढ़ बातों को यहीं विराम देते हैं। अब मनु कुछ अपनी बात करता है।
सच कहूँ तो मनु यह सोचकर ही घबरा जाता है कि उसे पुनः मनुष्य योनि प्राप्त करने के लिए 84 लाख योनियों में भटकना पड़ेगा। यह कल्पना ही मनु को बेचैन कर देती है। उसे तो लगता है, मानो वह अपनी आँखों के सामने इस पूरी यात्रा को घटित होते हुए देख रहा हो। न जाने कितने जन्म, न जाने कितने शरीर और न जाने कितनी तरह की परेशानियाँ!
लेकिन एक बात है। मनु की इच्छा इस नश्वर संसार में एक और जन्म लेने की है। आखिर संसार से उसका मोह अभी पूरी तरह समाप्त कहाँ हुआ है! हाँ, लेकिन अगले जन्म में वह मनुष्य योनि में जन्म लेना बिल्कुल नहीं चाहता।
अब आप पूछेंगे कि आखिर मनु चाहता क्या है?
तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मनु अगले जन्म में एक कुत्ता बनना चाहता है। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा—एक कुत्ता!
लेकिन ठहरिए जरा ! मनु कोई ऐसा-वैसा कुत्ता नहीं बनना चाहता। उसकी इच्छा किसी गली-मोहल्ले में घूमने वाले तथाकथित स्ट्रीट डॉग या देसी कुत्ते के रूप में जन्म लेने की नहीं है। वैसे सभी अपने अपने जगह पर देसी ही तो हैं ।
भाई, हमें तो विदेशी चीज़ें हमेशा से आकर्षित करती रही हैं। विदेशी गाड़ी, विदेशी कपड़े, विदेशी मोबाइल, विदेशी रहन-सहन—हमारी निगाहें हमेशा विदेश की ओर लगी रहती हैं। जब हर चीज़ में विदेशी होने का आकर्षण है, तो फिर कुत्ते के मामले में ही देसीपन क्यों?
इसलिए मनु की इच्छा है कि अगले जन्म में वह किसी बढ़िया विदेशी नस्ल का कुत्ता बने। ऐसा कुत्ता, जिसकी नस्ल सुनते ही लोग प्रभावित हो जाएँ। नस्ल का नाम बोलने पर गर्व का अहसास हो । जिसके सामने से गुजरते हुए लोगों के चेहरे पर प्रशंसा के भाव अपने आप उभर आएँ।
आखिर इस जन्म में मनुष्य होकर भी मनु वह सब कुछ कहाँ हासिल कर पाया, जिसकी उसने कल्पना की थी! इसलिए क्यों न अगले जन्म में ऐसी योनि चुनी जाए, जिसमें बिना किसी प्रतियोगी परीक्षा, बिना किसी साक्षात्कार, बिना किसी सिफारिश और बिना किसी संघर्ष के ही सुख-सुविधाओं का इंतजाम हो जाए!
कल्पना कीजिए, मनु मर्सिडीज की पिछली सीट पर बैठा है। गाड़ी की खिड़की से अपना मुँह बाहर निकालकर वह दुनिया का नज़ारा ले रहा है। सड़क पर चलते लोग उसे रश्क भरी निगाहों से देख रहे हैं। कोई उसकी नस्ल पर मुग्ध है, कोई उसके रखरखाव पर और कोई उसके मालिक की हैसियत पर। मनु मन ही मन मुस्करा रहा है। इस जन्म में लोग उसकी हैसियत पूछते थे, अगले जन्म में उसकी नस्ल पूछेंगे!
और मजे की बात देखिए—इस जन्म में अगर घर के किसी सदस्य को छींक आ जाए, तो कोई खास बात नहीं। लेकिन अगले जन्म में मनु को छींक आ गई, तो घर में हलचल मच जाएगी। तुरंत डॉक्टर से संपर्क किया जाएगा, दवाइयों की व्यवस्था होगी और उसकी सेहत की निगरानी शुरू हो जाएगी। घर के सदस्यों को अपनी तकलीफों के लिए भले ही डॉक्टर के पास जाने का समय न मिले, लेकिन मनु की तबीयत बिगड़ते ही सबकी प्राथमिकताएँ बदल जाएँगी।
आखिर वह कोई मामूली कुत्ता थोड़े ही होगा! वह एक प्रतिष्ठित विदेशी नस्ल का कुत्ता होगा। उसकी देखभाल में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। उसके खान-पान का विशेष ध्यान रखा जाएगा। उसके लिए खाने का सामान किसी तय दुकान से आएगा, कपड़े किसी खास दुकान से खरीदे जाएँगे । ऐसे ढेरों शोरूम आजकल खुले हुए हैं ।उसकी पसंद-नापसंद का पूरा ख्याल रखा जाएगा। घर में खाना बने या न बने, लेकिन मनु की पसंद का खाना समय पर उपलब्ध होना चाहिए।
सुबह-शाम उसे घुमाने के लिए एक व्यक्ति हमेशा तैयार रहेगा। उसे नित्य क्रिया से निवृत्त कराने की जिम्मेदारी भी किसी और की होगी। डाग हैंडलर को अंग्रेज़ी की इतनी समझ तो होनी ही चाहिए ताकि वो मनु से बात कर सके और उसकी समझ सके ।
मनु को न तो नौकरी पर जाने की चिंता होगी, न बॉस की डाँट सुनने का डर, न बच्चों की फीस भरने की परेशानी और न ही महीने के अंत में बैंक खाते का हिसाब लगाने की मजबूरी।
न प्रमोशन की चिंता, न ट्रांसफर का भय, न अपार की फिक्र जो हर साल मुआ मुँह उठाकर खड़ा हो जाता है और पूरे साल एक अज्ञात भय से डराकर रखता है । किसी विभागीय बैठक में अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का दबाव भी उसपर नहीं रहेगा । कोई लक्ष्य नहीं, कोई टारगेट नहीं, कोई डेडलाइन नहीं। बस समय पर खाना, नियमित सैर, आरामदायक बिस्तर और भरपूर प्यार!
मनु सोचता है कि आखिर इससे बेहतर जीवन और क्या हो सकता है?
मनुष्य योनि में जन्म लेते ही संघर्ष शुरू हो जाता है।
मनुष्य पूरी जिंदगी किसी न किसी दौड़ में शामिल रहता है। उसे लगता है कि एक दिन वह मंजिल पर पहुँच जाएगा, लेकिन मंजिल आती कहाँ है! एक पड़ाव पूरा होता है, तो दूसरा सामने खड़ा मिल जाता है। और जब तक उसे ठहरने का अवसर मिलता है, तब तक जिंदगी का सफर लगभग समाप्त हो चुका होता है। फिर आदमी स्वयं वर्तमान से निकलकर दूसरों की स्मृतियों में जगह बना लेता है।
मनु को लगता है कि अगले जन्म में इन सब झंझटों से मुक्ति मिल सकती है। आखिर एक संपन्न परिवार का पालतू विदेशी कुत्ता बनकर जीने में बुराई ही क्या है? उसे पालने-पोसने वाले व्यक्ति के पास पर्याप्त साधन होने चाहिए। बस, इतना सुनिश्चित हो जाए कि उसकी देखभाल में कोई कमी न रहे। फिर तो वह भी किसी वीआईपी से कम नहीं होगा।
और हाँ, वीआईपी होने का असली मजा तो तब है, जब आपको कोई कुत्ता कहने की हिमाक़त न करे!
यहीं आकर मनु को इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू दिखाई देता है। एक कुत्ते को कुत्ता कहने में लोग संकोच नहीं करते, लेकिन किसी मनुष्य को कुत्ता कह दिया जाए, तो यह गाली बन जाती है। वही शब्द, लेकिन संदर्भ बदलते ही अर्थ बदल जाते हैं। विदेशी नस्ल का कुत्ता घर का गौरव है, जबकि किसी मनुष्य को कुत्ता कह देना उसके अपमान का पर्याय बन जाता है।
मनु सोचता है कि आखिर यह कैसी विडंबना है! एक ओर मनुष्य अपने जीवन में सम्मान पाने के लिए तमाम संघर्ष करता है, अपनी योग्यता साबित करता है, सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने की कोशिश करता है; दूसरी ओर एक पालतू कुत्ते को सम्मान पाने के लिए कुछ साबित नहीं करना पड़ता। उसकी नस्ल, उसका मालिक और उसकी जीवनशैली ही उसके विशेष दर्जे के लिए पर्याप्त हैं।
बेचारा मनुष्य तो जन्म से लेकर मृत्यु तक न जाने कितने प्रकार के भेदभाव का सामना करता है। कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, कभी आर्थिक हैसियत के नाम पर, कभी पद और प्रतिष्ठा के नाम पर। उसकी योग्यता भी कई बार उसके परिचय, संपर्क और हैसियत के सामने छोटी पड़ जाती है। वहीं, एक संपन्न परिवार का पालतू कुत्ता इन तमाम सामाजिक उलझनों से लगभग बेखबर अपने जीवन का आनंद लेता रहता है।
उसका मालिक ही उसकी दुनिया है और मालिक की संपन्नता ही उसकी सुविधाओं और सुकून का आधार।
अब मनु के मन में एक और सवाल उठता है। आखिर मनुष्य होने का इतना अभिमान किस बात का? यदि मनुष्य होने का अर्थ जीवन भर संघर्ष करना, इच्छाओं के पीछे भागना, दूसरों से अपनी तुलना करना और सम्मान पाने के लिए लगातार अपनी उपयोगिता सिद्ध करना है, तो फिर उस योनि में लौटने की इतनी बेचैनी क्यों?
क्यों न अगले जन्म में एक ऐसा जीवन मिले, जिसमें अपनी जरूरतों के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े, अपनी पसंद की चीज़ें पाने के लिए दिन-रात मेहनत न करनी पड़े और हर समय अपनी योग्यता साबित करने की मजबूरी भी न हो!
हाँ, मनु यह भी जानता है कि हर कुत्ते की किस्मत ऐसी नहीं होती। सड़कों पर भटकते, भूख-प्यास और बीमारी से जूझते कुत्तों की जिंदगी भी कम संघर्षपूर्ण नहीं है। इसलिए मनु की इच्छा केवल कुत्ता बनने की नहीं, बल्कि एक संपन्न परिवार में पलने वाले, विदेशी नस्ल के, लाड़-प्यार से पाले गए कुत्ते के रूप में जन्म लेने की है। आखिर अगले जन्म के लिए भी उसने अपनी पसंद और प्राथमिकताएँ तय कर रखी हैं!
अब आप ही बताइए, मनु की यह इच्छा क्या ग़लत है ?
मनु तो बस इतना चाहता है कि इस बार उसे जन्म के साथ संघर्षों की गठरी न मिले, बल्कि सुविधाओं का एक तैयार संसार मिल जाए। उसे अपनी पहचान बनाने के लिए जिंदगी भर पसीना न बहाना पड़े, बल्कि उसकी पहचान उसके मालिक की हैसियत और उसकी नस्ल से ही बन जाए।
अब निर्णय आपको करना है—मनु का अगले जन्म में विदेशी नस्ल का कुत्ता बनने का फैसला सही है या गलत?
और यदि आपको मनु की यह इच्छा गलत लगती है, तो जरा यह भी सोचिएगा कि आखिर मनुष्य होकर भी उसे मनुष्य योनि में दोबारा जन्म लेने से डर क्यों लग रहा है!
कहीं ऐसा तो नहीं कि मनु की यह विचित्र इच्छा हमारे समाज की उस सच्चाई को उजागर कर रही है, जहाँ कई बार मनुष्य की कीमत उसके गुणों से नहीं, बल्कि उसकी हैसियत से तय होती है?
खैर, मनु तो अगले जन्म की तैयारी में है।
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
