सम्पादकीय

रविवारीय- बदलती दुनिया, वही पुराना ढर्रा – सपाट ज़िंदगी पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी

🖋️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

पूरा विश्व हलकान है । सभी जगह उथल पुथल मची हुई है । हताशा और निराशा के बीच उनकी ज़िंदगी चल रही है । सारे समीकरण ध्वस्त हो चले हैं । सभी अपनी डफली अपना राग

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

अलाप रहे हैं । कोई इसे आपदा में अवसर मान बैठा है तो कोई सर पकड़ कर बैठा है । चारों ओर एक अनिश्चितता का माहौल है ।
कल तक जो दृश्य बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रहा था, आज वो थोड़ा धुंधला नज़र आ रहा है । पता नहीं क्या हो रहा है? क्या ग्रह नक्षत्रों ने अपनी चाल बदल दी है ?
हाँ, पर एक बात ज़रूर है हमारे साथ ऐसा कोई परिवर्तन दिख नहीं रहा है । भाई हम भी तो चाहते हैं कुछ परिवर्तन हमारे जीवन में भी हो । हमारे समीकरण भी बदलें । जिस तरह पूरा विश्व बदलते हुए समीकरण को अपने अपने नज़रिए से परिभाषित कर रहा है, कुछ आनंदित हो रहे हैं तो कुछ परेशान भी हो रहे हैं । कुछ वैसा हमारे साथ भी तो हो । वर्षों से एक ही विदेश नीति चलती आ रही है , और हम हैं कि उसी पर क़ायम हैं । हमारी भी विदेश नीति में कुछ बदलाव आए । बदलाव तो प्रकृति का नियम है । चालीस वर्षों से ज़िंदगी एक ही समीकरण पर संतुलन साधे हुए हैं, बिलकुल शाम होते ही लौटते हुए बैल की तरह जो कुछ भी हो जाए अपने घर का रास्ता नहीं भूलता ।
“ न जी भर के देखा ना कुछ बात की, बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की “
वाक़ई एक आरज़ू थी कि हमारे भी समीकरण बदलें, हमारी विदेश नीति में कुछ बदलाव आए, ग्रह नक्षत्र थोड़े इधर थोड़े उधर हों, कुछ पहाड़ों पर जाएँ कुछ मैदानों पर रहें तो कुछ बात बने । यहाँ तो पूरी की पूरी ज़िंदगी एक ही ढर्रे पर बीती जा रही है । अब तो ऐसा हो गया है कि ऑंखें मूँद कर भी चलो तो रास्ता भटकने की कोई गुंजाइश नहीं! थोड़ा रास्ता भटकें नहीं, थोड़ा विपक्षियों ने- मेरा मतलब पड़ोसियों ने चटखारे नहीं लिए, दबी ज़ुबान से चर्चे नहीं हुए और तो और सोशल मीडिया पर ख़बरें वायरल नहीं हुई , सड़कों पर थोड़ी धींगा मस्ती नहीं हुई तो क्या मतलब है ऐसी ज़िंदगी जी कर ।
फिर तो लानत है ऐसी ज़िंदगी पर ।
बिलकुल सपाट और निर्विघ्न ज़िंदगी ।
खैर । अब तो आप मेरी बातें और मेरा इशारा और इरादा दोनों ही समझ गए होंगे । अगर नहीं समझे तो अब हम कुछ नहीं कर सकते हैं । सर के बाल थोड़े बहुत बचे हुए हैं उसे रहने दीजिए ।अब इस उम्र में इतनी ताक़त नहीं बची कि मुक़ाबला बराबरी का किया जा सके और ना ही मैच को आख़िरी तक ले जाने का जज़्बा बचा है ।
“ समझ समझ कर
समझ को समझें ।
समझ समझना भी एक समझ है ॥
जो समझ समझकर भी ना समझे ।
मेरी समझ में वो नासमझ है ॥
बस इन्हीं शब्दों के साथ हम अपने जज्बातों को और अपनी इच्छाओं को यहीं पूर्णविराम देते हैं ।

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