सम्पादकीय

बुराइयों के दौर में भलमनसाहत की मिसाल, “मनु की रविवारीय में पढ़िए”- खोए मोबाइल ने सिखाया विश्वास का मतलब

इंसानियत

कौन कहता है दुनिया से इंसानियत ख़त्म हो गई है । जहाँ एक ओर बड़ी बेरहमी से रिश्तों का खुन हो रहा है । भरोसा टूट रहा हो उसी

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

बीच कुछ ऐसी ख़बर आती है तो लगता है, अभी भी बहुत कुछ बाक़ी है । बस ज़रूरत है उसे सहेजने की । आजकल हमारे सामने एक समस्या आ खड़ी हुई है । हम सोशल मीडिया चाहे वो प्रिंट मीडिया हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसकी ख़बरों को अक्षरशः सही मान लेते हैं । हम इतना भी ज़रूरी नहीं समझते कि कम से कम उसे एक तार्किक दृष्टिकोण तो दें । हमारी पूरी की पूरी राय सिर्फ़ और सिर्फ़ उसपर ही आधारित होती है । घटना के पीछे जाकर उसे समझने की हम कोशिश नहीं करते । परिणाम हम सबके सामने है ।
खैर । हम बातें कर रहे थे इंसानियत और भरोसे की । अभी कुछ दिन पहले की ही घटना है । हमारे कुछ परिचित हमसे मिलने हमारे दफ़्तर आए हुए थे । सामान्य शिष्टाचार की बातें चल रहीं थीं । चाय आ चुकी थी । अचानक से उनमें से एक ने महसूस किया कि उनका दोनों मोबाइल फोन उनके पास नहीं है । वो बिल्कुल घबरा गए । आप समझ सकते हैं आज के दिन मोबाइल कितना अहम किरदार निभाता है आपकी ज़िंदगी में । हमारी पूरी की पूरी ज़िंदगी उसके इर्द गिर्द घूमती रहती है । आपकी अर्थ व्यवस्था से लेकर सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था तक । उनकी हालत देखने लायक थी । एक तो अंजाना शहर कुछ करते नहीं बन रहा था । तभी मैंने उनसे नंबर लेकर उनके एक मोबाइल नंबर पर कॉल किया तो वो बजने लगा तो मैंने उनसे कहा घबराए नहीं मोबाइल आपका जहाँ भी है सुरक्षित हाथों में है क्योंकि अगर किसी ग़लत हाथों में पड़ता तो रिंग बजने का सवाल ही पैदा नहीं होता । उनके दूसरे नंबर पर भी कॉल जा रहा था । अब तो हम बिल्कुल ही आश्वस्त थे कि देर सबेर मोबाइल तो मिलना ही है । तभी उधर से कॉल आता है और कॉल करने वाले ने बताया कि आप जिस टैक्सी से उतर कर आए थे आपने अपना मोबाइल उसी टैक्सी पर ही छोड़ दिया था । उस टैक्सी वाले ने दोनों मोबाइल मेरे पास दे रखा है । आप आयें और अपना मोबाइल अपनी पहचान बता कर ले जाएं । हमारे पास बैठे जो हमारे परिचित सज्जन थे अब उनके जान में जान आई जो अभी तक हलक में अटकी हुई थी । चेहरे पर जो उनके उदासी छाई हुई थी वो अब जाकर मुस्कान में तब्दील हुई । दरअसल उनके मोबाइल को गुम हुए लगभग दो घंटे से अधिक हो चुके थे और उन्हें पता तक नहीं था ।
दरअसल उन्हें हमारे दफ़्तर आना था और गलती से वो कहीं और किसी दफ़्तर में पहुँच गए थे। टैक्सी से वो वहीं उतर कर उसी बिल्डिंग में अंदर चले गए ,वहाँ जाकर उन्हें मालूम चला कि वो ग़लत जगह पर आ गए हैं फिर वो वहाँ से हमारे दफ़्तर आए जो तक़रीबन एक किलोमीटर की दूरी पर था । इस दौरान वैसे ही बहुत समय निकल चुका था । टैक्सी ड्राइवर की इंसानियत कहें या फिर भलमनसाहत वो तो सिर्फ़ इतना ही जानता था कि ये लोग इस बिल्डिंग के सामने उतरे हैं तो शायद वहीं गए होंगे । उसने वहाँ के सिक्योरिटी गार्ड्स के पास दोनों फोन जमा करवा दिए । उस टैक्सी ड्राइवर के बारे में सोचें उसने तो आपसे धन्यवाद लेने तक का कोई स्कोप नहीं रखा। बिल्कुल निर्विकार और निर्लिप्त भाव से उसने अपना फ़र्ज़ निभाया गोया उसने अलग से कुछ किया ही न हो । आप कितना भी कह सुन लें आज भी दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिनके ईमानदारी, इंसानियत और भलमनसाहत की वजह से विश्वास क़ायम है ।
ईमानदारी, इंसानियत और भलमनसाहत आज भी समाप्त नहीं हुई है। वे अब भी हमारे आसपास मौजूद हैं—बस उन्हें पहचानने की दृष्टि चाहिए।
सच तो यह है कि दुनिया केवल बुराइयों से नहीं चलती; कुछ अनदेखी अच्छाइयाँ भी इसे अब तक थामे हुए हैं।

मनीष वर्मा “मनु”

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