सम्पादकीय

साहित्य के संत, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- मुंशी प्रेमचंद : जिन्होंने जीवन भी अपनी कहानियों की तरह जिया

अभी दो दिन पहले ही हमने महान कथाकार, उपन्यास सम्राट की 146 वी जयंती मनाई है । आप चाहें उनके नाम के आगे कितने भी विशेषण लिख लें कम ही होगा । साहित्य के विधा में उन्हें किसी

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

एक दायरे में रख पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है । साहित्य का नोबेल पुरस्कार उन्हें क्यों नहीं मिला यह भी एक आश्चर्य की बात है । शायद नोबेल भी अपने आप को इनके नाम से जुड़कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता । एक ऐसा लेखक जो पात्रों के मनोविज्ञान को जानता था । प्रेमचंद को पढ़ते वक़्त ऐसा लगता था मानो पात्र आपके सामने चलचित्र की तरह दिखाई पड़ रहे हैं । एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक लेखक थे वो जिन्होंने अपनी शर्तों पर काम किया । तो आइए ऐसे विराट व्यक्तित्व के स्वामी के बारे में उनकी 146 वी जयंती पर कुछ शब्द मनु की कलम से ।
भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो प्रेमचंद और हिंदी साहित्य में उनके योगदान को नहीं जानता होगा। हिन्दी साहित्य में उनका क्या योगदान है, यह शायद ही किसी से छुपा है। आज भी हिन्दी के लेखकों की तुलना अगर की जाती है तो, कहीं-न-कहीं प्रेमचंद से ही की जाती है। अगर आपने मुंशीजी’ को नहीं पढ़ा, तो आपने भारत नहीं देखा। मुझे इस संदर्भ में ‘असगर वजाहत’ का वह नाटक बस ज़ोहन में उतर जाता है ‘जिस लाहौर नहीं देख्या ओ जम्याई नई ‘ । वाकई प्रेमचंद के साहित्य के बारे में कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है। आज भी इतने वर्षों के बाद भी मुंशीजी और उनका साहित्य प्रासंगिक है। हम सभी गौरवान्वित हैं कि प्रेमचंद हमारे थे और हमने उन्हें पढ़ा है। आइए आज हम जानते हैं प्रेमचंद के जीवन के कुछ अहम पहलुओं को। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि मुंशी प्रेमचंद की शादी एक बाल विधवा, शिवरानी देवी, जिनकी शादी महज ग्यारह साल की उम्र में हुई थी और शादी के तीन महीने के बाद ही वो विधवा हो गई थी, से हुई थी। उस वक्त के अखबार में शिवरानी देवी के पिता मुंशी देवी प्रसाद जी ने उनकी शादी की बाबत एक इश्तेहार दिया था और उसी इश्तेहार को देखकर प्रेमचंद जी ने अपने बारे में अपनी शिक्षा और वेतन के बारे में अपने होने वाले ससुर मुंशी देवी प्रसाद जी को बता कर एक बाल विधवा से शादी की रजामंदी भेज दी थी। बस जरा कल्पना करें जो चीजें आज भी आपको असहज कर जाती हैं। निर्णय लेना इतना आसान नहीं होता है। आज से लगभग सौ साल पहले किसी व्यक्ति का स्वेच्छा से बाल विधवा को अपनाना कितना बड़ा दिल रहा होगा मुंशीजी का! क्या चरित्र रहा होगा उनका। मैं तो क्या, कोई भी इसे बस सोचकर ही मुंशीजी के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित कर देगा। कोई यूं ही महान नहीं होता। हालाकि, उनकी पत्नी के बारे में बहुत कुछ नहीं लिखा गया है, पर जो भी जानकारी उपलब्ध है, वह उनके शक्तिशाली चरित्र को बताने के लिए काफी है।
एक स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने महिलाओं को नेतृत्व प्रदान करते हुए दो महीने की जेल की सजा भी काटी थी और यह बात मुंशी प्रेमचंद जी को उनके जेल जाने के बाद पता चली। 59उनकी 1931 में आई पुस्तक ‘साहस’ जब छपी और प्रकाशक ने उसकी प्रति मुंशीजी को I मेजी तब उन्हें पता चला कि शिवरानी देवी एक साहित्यकार भी हैं। समसामयिक विषयों और घटनाओं पर उनकी पैनी नजर रहती थी। उनकी एक पुस्तक “ प्रेमचंद घर में “ एक महत्वपूर्ण योगदान है प्रेमचंद के साहित्य और उनके जीवन के संदर्भ मे । अगर आप प्रेमचंद को, उनके जीवन को उनके चरित्र को जानना चाहते हैं, तो आपके लिए यह एक धरोहर है। शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक प्रेमचंद घर में मे एक जगह प्रेमचंद के बारे में लिखा है- ‘व ह बहुत ऊँचे हृदय के आदमी थे। यहां तक कि मजदूरों को भी वे अपने सामान ही समझते थे। सबकी तकलीफों का ध्यान रखते थे। वे अक्सर अपने को मजदूर कहते। इंसान और हैवान में बस इतना ही फर्क है। वे एक संत थे।” वाकई जिन्होंने भी प्रेमचंद को पढ़ा है वो जानते है कि वो वाकई एक संत थे।
प्रेमचंद के जीवन का एक अहम पहलू यह भी है, जिसके बारे में अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है—उनकी पहली शादी । प्रेमचंद का पहला विवाह उस वक़्त की सामाजिक और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कम उम्र में ही हुआ था। उनकी पहली पत्नी के बारे में बहुत अधिक जानकारी तो नहीं है , पर इतनी बात कही जा सकती है कि यह विवाह सुखद नहीं रहा और दोनों के संबंधों में समय के साथ दूरी बढ़ती गई। अंततः दोनों अलग हो गए। प्रेमचंद के जीवन में यह पहला वैवाहिक अनुभव उनके संघर्षपूर्ण जीवन की अनेक घटनाओं में से एक था।
प्रेमचंद ताजिंदगी अपने सिद्धांतों की वजह से मुफलिसी में रहे , पर कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सच्चाई के बिल्कुल ही करीब था उनका चरित्र। नाटक से कोसों दूर। सेवा भाव इतना कि पत्नी के बीमार पड़ जाने पर पत्नी की सेवा करने के साथ ही घर का खाना भी खुद ही बनाते। बच्चों को खुद पढ़ाते थे। ट्यूटर रखना उन्हें पसंद नहीं था। दो-तीन घंटे का समय वे प्रतिदिन अपने बच्चों को पढ़ाने मे लगाते थे। महिलाओं के अधिकार के प्रति वो काफी सजग रहा करते थे। महिलाओं को बराबरी के अधिकार मिले उसके लिए बराबर प्रयासरत रहते थे। राय साहब हरविलास शारदा के प्रयास से सन 1929 में लार्ड ड्रविन के वायसराय रहते हुए ‘बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929’ पारित हुआ। इस अधिनियम के पारित होते ही लड़कों एवं लड़कियों के विवाह को न्यूनतम आयु तय कर दी गई। हालांकि कट्टरपंथियों ने उस वक्त इसका बहुत विरोध किया। प्रेमचंद ने जागरण में एक लेख द्वारा हरविलास शारदा के इस कृत्य पर उन्हें बधाई दी और अन्य बातों के अलावा कहा कि भारतीय महिलाएँ आपकी हमेशा कृतज्ञ रहेंगी। बहुत ही विराट व्यक्तित्व के स्वामी थे प्रेमचंद । उनके बारे में जितना कहा जाए कम ही होगा। एक पुरी किताब लिखी जा सकती है ।

मनीष वर्मा “मनु”

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