वो सोन पापड़ी वाला बचपन, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- जब मिठाई के लिए इंतज़ार भी एक खुशी हुआ करता था
बचपन की अपनी मिठाई सोन पापड़ी कब सोहन पापड़ी हो गई, पता ही नहीं चला। हालाँकि, कहीं इसे सोन पापड़ी कहते थे और कहीं सोहन पापड़ी, पर है दोनों एक ही चीज़। इसकी उत्पत्ति कब

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
और कहाँ हुई, कैसे हुई—हमें इस विवाद में नहीं पड़ना है। वैसे मूलतः यह मिठाई तो हमारे यहाँ की ही है, पर कहीं-कहीं इस बात का उल्लेख मिलता है कि शायद पर्शिया से इसका कुछ संबंध हो। अब यह सच है या महज़ एक किस्सा, हमें इस बात से कोई लेना-देना नहीं ! हमारे लिए तो इसका रिश्ता इतिहास और भूगोल से कहीं ज़्यादा हमारी यादों से है , हमारे बचपन से है ।
खैर! बेसन, चीनी और घी से बनी यह मिठाई जिसकी उत्पत्ति कहीं भी हुई हो, पर हमारे लिए तो यह वही मिठाई है , जिसे हमारे बचपन के दिनों में कोई बंदा साइकिल पर या कभी-कभी पैदल भी लेकर आता था। उसके पास एक पुराना-सा टिन का डिब्बा होता था, जिसकी कलई लगभग निकल चुकी होती थी, उसी में सोन पापड़ी रखी होती थी । कभी उसी तरह के डिब्बे में हमारा मनपसंद ग्लूकोज़ बिस्किट या फिर Britannia Milk Bikis आया करता था। डिब्बे की हालत ऐसी होती जिसे देखकर यही लगता था कि कहीं वह भी फ़्लैशबैक में जाकर किसी अपने को पहचानने की कोशिश कर रहा है । लगभग जंग लगा हुआ वो टिन का डिब्बा !
उस व्यक्ति के पास होता था वही ढाई किलो का छोटा डिब्बा या फिर पाँच किलो का बड़ा डिब्बा । बस यही हमारी दुनिया थी। हम यह नहीं जानते कि उस वक़्त हमारी पसंदीदा सोन पापड़ी , आज जिस स्वरूप में मिठाई की दुकानों पर मिलती है, वैसी ही होती थी या नहीं। हमें तो बस इतना मालूम था कि वह हल्के पीले रंग की होती थी और बुढ़िया के बाल जैसी लगती थी। यह हमारे बचपन की शब्दावली है । आप अन्यथा इसे कोई और अर्थ न दें।
हमारे जैसे उस पीढ़ी के न जाने कितने बच्चों के लिए सोन पापड़ी का स्रोत वही व्यक्ति या उसके जैसा कोई व्यक्ति हुआ करता था, जिसका इंतज़ार हमें हफ़्तों रहता था। वह कभी साइकिल से आता, कभी पैदल। दूर से ही उसकी आहट या आवाज़ पहचान में आ जाती। उसके आते ही जैसे घर के आसपास का पूरा वातावरण बदल जाता। हम उसके पीछे-पीछे पहुँच जाते और फिर शुरू होती हमारी छोटी-सी बातचीत—कितने की दोगे? इतना दे दो। थोड़ा और दे दो। मोल भाव की पूरी गुंजाइश रहती थी ।
कभी दो-चार पैसे देकर, तो कभी पुरानी कॉपी-किताबें, जिनका अब कोई उपयोग नहीं था, देकर हम सोन पापड़ी हासिल करते थे। उस समय पैसे की कीमत भी कुछ और थी और चीज़ों की कीमत भी। आज की तरह नहीं कि बस जेब में पैसे हैं और मन हुआ तो दुकान पर गए और मिठाई खरीद लाए—ऐसा कहाँ था!
सोन पापड़ी के लिए भी जुगाड़ लगाना पड़ता था, इंतज़ार करना पड़ता था और कभी-कभी थोड़ी मशक़्क़त भी। लेकिन शायद उसी इंतज़ार ने उस मिठाई का स्वाद हमारे लिए इतना खास बना दिया था।
आज सोचता हूँ तो लगता है कि उस समय हमें यह भी पता नहीं था कि सोन पापड़ी चौकोर होती है या थोड़ी मोटी, पतली या किसी खास आकार की। हमारे लिए तो वह बस हल्के पीले रंग की, महीन-महीन रेशों वाली मिठाई थी। उँगलियों से छूते ही जैसे बिखर जाने वाली। मुँह में रखते ही घुल जाने वाली। और शायद इसीलिए इतनी अपनी लगने वाली।
बचपन के दिन और उनकी यादें भी एक अजीब-सी सुखद अनुभूति प्रदान करती हैं।
उन दिनों की अपनी एक अलग भाषा थी, अपनी शब्दावलियाँ थीं। आज उन्हीं शब्दों को याद करके कभी-कभी खूब हँसी आती है कि वाकई हम ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया करते थे।
हमारे यहाँ रसोईघर को भंसाघर कहते थे और जूठन को सखरी ।
आज हम थोड़ा पढ़-लिख गए हैं। तथाकथित अच्छे लोगों के बीच शहरों में रहते हैं। हमारी भाषा भी थोड़ी बदल गई है। अब कहाँ गए वो शब्द? अब तो हमारी ज़ुबान पर किचन के अलावा कोई दूसरा शब्द ही नहीं रहता। भंसाघर कहने में जैसे हम खुद ही थोड़ा संकोच करने लगेंगे। सखरी तो अगर मैं ही एक दो मर्तबा बोल दूँ तो मुझे खुद में यह शब्द अनजाना सा लगने लगता है ।लेकिन बचपन में यही हमारा शब्द था और शायद इसीलिए आज भी जब कभी कोई ‘भंसाघर’ कह देता है तो भीतर कहीं बहुत पुराना कोई दरवाज़ा खुल जाता है। मनु कहीं फ़्लैशबैक में चला जाता है ।
बचपन की यही तो खूबसूरती है—उसके पास अपनी भाषा होती है, अपने शब्द होते हैं, अपने लोग होते हैं और अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ होती हैं। उन खुशियों की कोई बड़ी वजह नहीं होती। एक टिन के डिब्बे में आई सोन पापड़ी ही बहुत होती थी। किसी के आने का इंतज़ार ही बहुत होता था। कुछ पुराने काग़ज़-किताब देकर मनपसंद मिठाई मिल जाना ही बहुत बड़ी उपलब्धि हुआ करती थी।
और फिर वही सोन पापड़ी, जिसके लिए हम हफ़्तों इंतज़ार करते थे, जिसके लिए जुगाड़ लगाते थे, जिसके लिए कभी पैसे बचाते थे और कभी पुरानी कॉपी-किताबों का सहारा लेते थे—आज हमारे लिए हर जगह उपलब्ध है।
आज जब चाहें, जहाँ चाहें, सोन पापड़ी खरीद सकते हैं। मिठाई की दुकान पर जाइए, पैकेट उठाइए और घर ले आइए। न किसी का इंतज़ार, न कोई जुगाड़, न कोई मशक़्क़त।
लेकिन फिर भी…
वो बात कहाँ जो हमारे बचपने की सोन पापड़ी में थी।
✒️ मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
