दोस्ती, लाइक्स और फॉलोअर्स का कारोबार, “मनु की रविवारीय” में पढ़िए- जब सोशल मीडिया के रिश्ते भी ‘लेन-देन’ बन जाएँ
मैं शून्य हूँ !!!!
चलिए, आज आपको कुछ वैसी बातें बताते हैं, जिन्हें आप और हम सभी जानते हैं; पर सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं।

स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा
तभी तो अनदेखा करते हैं ।
अनदेखा करना समस्या का समाधान नहीं है । समस्या का समाधान तो समस्या से दो चार हाथ करके ही हो सकता है ।
हाँ, तो मैं कह रहा था कि फ़ेसबुक पर हमारे दोस्तों की संख्या लगभग दो हज़ार के आसपास है। अगर इसमें उन लोगों को भी जोड़ दिया जाए, जिन्होंने मुझे समय समय पर फ़्रेंड्स रिक्वेस्ट भेजा है, तो यह संख्या लगभग तीन हज़ार के आसपास पहुँचती है। इनमें से कईयों की फ़्रेंड्स रिक्वेस्ट तो मैंने मारे डर के रिमूव कर दी है और लगातार करता रहता हूँ, आगे भी करता रहूँगा। इस बात का डर है मुझे कि न जाने किस रूप में मुझे भूत-प्रेत-वेताल आदि के दर्शन हो जाएँ। कोई कहीं से आकर मुझे डिजिटल अरेस्ट कर ले। दिन-रात मेरे फोन की घंटी घनघनाती रहे। मेरे दिल की धड़कन इतनी बढ़ जाए कि कहीं मुझे ऐसा ना लगने लगे की मुझे दिल का रोग लग गया है ।
खैर ! बड़ी उत्कट इच्छा थी मेरी कि कभी किसी भी रूप में मुझे भगवान के दर्शन हो जाएँ, पर अब नहीं रही। हर कोई अपने आप को ईश्वर ही समझ बैठा है। हमने भी मान लिया। जब ईश्वर हर जगह मौजूद हैं, तो फिर काहे का चिल्ल-पों मचाना ! हमने भी समझौता कर लिया है ।
ख़ैर!
सोशल मीडिया पर मेरे बहुत सारे मित्र हैं। ज्ञात-अज्ञात, लगभग सभी सोशल मीडिया मंचों पर मैं सक्रिय हूँ। पर एक बात मुझे हमेशा खलती है—अगर मैं अपनी तरफ़ से आगे बढ़कर किसी को फ़ोन न करूँ, उनसे संवाद न करून तो शायद ही मेरे ये सोशल मीडिया के धुरंधर मुझे कभी याद करें।
सोशल मीडिया पर भी एक अजीबोगरीब तरीके की प्रतिद्वंद्विता दिखाई देती है। अगर आपने किसी की पोस्ट को लाइक या कमेंट नहीं किया, या कभी करते ही नहीं हैं, या फिर देखकर आगे बढ़ जाते हैं, तो यह बात आप बखूबी समझ लें कि सामने वाला भी आपको तवज्जो देने वाला नहीं है। जैसे ही आपने सामने वाले के पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की दन्न से आपके पोस्ट पर सामने वाले की भी प्रतिक्रिया आनी शुरू हो जाती है । यहाँ तो एक हाथ से लें और दूसरे हाथ से दें—बस यही चलता है।
यह कोई आज की बात नहीं है। पुराने समय से चलता आ रहा है। बचपन में हम सभी ने राजन-इक़बाल के बाल उपन्यास या फिर इंद्रजाल कॉमिक्स और अमर चित्र कथा पढ़ी है। आपको अपनी कॉमिकक्स कोई तभी देता था, जब आप उसे देते थे। यह एक अलिखित नियम था और हममें से कोई भी इसका अपवाद नहीं था । चीज़ें घूम-फिरकर आती हैं और हमें लगता है कि हमने तो इसे काफ़ी पहले छोड़ दिया था । अब कहाँ से यह आ गई ।
एक बात और है। हम सभी को कभी-कभी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि जब बातें आदान-प्रदान पर आधारित हैं, तो किसी की फ़ैन-फॉलोअर की संख्या लाखों में कैसे पहुँच जाती है?
भाई, जहां तक मेरी समझ कहती है , कुछ तो इस बाज़ार की ऐसी गुत्थियाँ हैं, जो आम लोगों की समझ से परे हैं। दूसरा, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिनमें लोग बँट जाते हैं। उन्हें इस बात का पता नहीं होता कि सच क्या है और झूठ क्या। बस, सभी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। किसी ने कह दिया++ कौआ कान लेकर भाग गया और हम बिना सोचें समझे , बिना आपने कान को देखे कौए के पीछे भाग रहे हैं । एक तरह की आंधी दौड़ है और हम सभी बिना आगा पीछा विचारे भागते जा रहें हैं ।
हाँ, कुछ अपवाद भी होते हैं। सेलिब्रिटीज़ के मामले में आप कह सकते हैं कि उनकी बात ही अलग है।
अब रही मेरी बात!
मैं तो शून्य हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि जिसके साथ रहूँगा, उसकी वैल्यू बढ़ जाएगी। मैं आज की दुनिया का शून्य हूँ। मैं वाक़ई सिफ़र हूँ, जिसकी अपनी कोई वैल्यू नहीं है।
जड़ हूँ मैं। मेरा अपना कोई वजूद नहीं है । मेरे सोचने-समझने की शक्ति धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है। बीच में एक नदी बह रही है और हम आधे नदी के इस पार और आधे उस पार, किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े हैं।
नदी की धारा अपने हिसाब से अविरल बहती जा रही है और हम एक अजीब से ऑब्सेशन के साथ तलवारें ताने खड़े हैं। नदी वही है । नदी का पानी भी नहीं बदल रहा है, पर हम हैं कि आपने मुताबिक नदी का नाम बदलने पर आमादा हैं । अपनी एक अलग सीमा तय कर रखी है हमने। नदी की धारा को क्या फ़र्क पड़ने वाला है? ऐसा लगता है, वाक़ई किसी ने हमारे सोचने-समझने की शक्ति पर ग्रहण लगा दिया है। निर्णय लेने की क्षमता अब ख़त्म होती जा रही है।
फ़ेसबुक पर मेरे मित्र—जी हाँ, आज की शब्दावली में हमारे सारे ही दोस्त हैं।
अब वह समय कहाँ रहा, जब दोस्ती बराबर वालों में हुआ करती थी? उम्र का एक लिहाज़ हुआ करता था। अब तो किसी भी उम्र का कोई भी व्यक्ति फ़्रेंड्स रिक्वेस्ट भेजकर हमारा मित्र हो सकता है। ख़ैर ! यहाँ हम थोड़ा भटक से गए हैं। पुरानी आदत है हमारी भटकने की। अन्यथा ना लीजिएगा। भटकने की हमारी पुरानी आदत जो है।
मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
