सम्पादकीय

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जब इलाज नहीं बचता, तब सम्मान से विदा की चाह, “रविवारीय” में आज पढ़िए- ‘लिविंग विल’ एक नई सोच का दस्तावेज़

कहाँ से कहाँ आ गए हम! अब जाकर ऐसा लगता है मानो हम सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं ।

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सम्पादकीय

संस्थाएं डिग्रियां नहीं, ज़िंदगियां दें — तभी शिक्षा का अर्थ है

(जब शिक्षा डर बन जाए) डिग्रियों की दौड़ में दम तोड़ते सपने संभावनाओं की कब्रगाह बनते संस्थान भारत में शिक्षा

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सम्पादकीय

युवा देश, वृद्ध नेतृत्व: क्या लोकतंत्र में उम्र जनादेश से बड़ी है?

✍️ प्रियंका सौरभ भारत आज संसार का सबसे युवा देश है। हमारी जनसंख्या का लगभग पैंसठ प्रतिशत भाग पैंतीस वर्ष

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कुल्हड़ में चाय, धुएं में बातें और टपरी पर जिंदगी, “रविवारीय” में पढ़िए एक ठहराव, एक मुलाकात, एक कहानी

चाय की टपरी एक छोटा सा नाम, पर यादों, मुलाकातों और क़िस्से कहानियों का बड़ा संसार। यह आपको हर जगह

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