सम्पादकीय

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स्कूल छोड़ती बेटियाँ: संसाधनों की कमी या सामाजिक चूक?

(“बेटियाँ क्यों छोड़ रही हैं स्कूल? सवाल सड़कों, शौचालयों और सोच का है” “39% लड़कियाँ स्कूल से बाहर: किसकी जिम्मेदारी?”

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सम्पादकीय

जब इलाज नहीं बचता, तब सम्मान से विदा की चाह, “रविवारीय” में आज पढ़िए- ‘लिविंग विल’ एक नई सोच का दस्तावेज़

कहाँ से कहाँ आ गए हम! अब जाकर ऐसा लगता है मानो हम सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं ।

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सम्पादकीय

संस्थाएं डिग्रियां नहीं, ज़िंदगियां दें — तभी शिक्षा का अर्थ है

(जब शिक्षा डर बन जाए) डिग्रियों की दौड़ में दम तोड़ते सपने संभावनाओं की कब्रगाह बनते संस्थान भारत में शिक्षा

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सम्पादकीय

युवा देश, वृद्ध नेतृत्व: क्या लोकतंत्र में उम्र जनादेश से बड़ी है?

✍️ प्रियंका सौरभ भारत आज संसार का सबसे युवा देश है। हमारी जनसंख्या का लगभग पैंसठ प्रतिशत भाग पैंतीस वर्ष

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