सम्पादकीय

जिंदगी का सच, “मनु की रविवारीय” में आज पढ़िए- परदे के पीछे रहकर भी पूरी व्यवस्था संभालते हैं ‘स्टेपनी’ जैसे लोग

स्टेपनी

समय का पहिया भी अजीब है। इतनी तेजी से घूमता है कि उसकी गति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है—ठीक वैसा ही जैसे

मनीश वर्मा ‘ मनु ‘
स्वतंत्र टिप्पणीकार और विचारक
अधिकारी, भारतीय राजस्व सेवा

किसी हाई-स्पीड ट्रेन के एयर कंडिशन डिब्बे में बैठे यात्री को उसकी रफ्तार का एहसास नहीं होता। बाहर सब कुछ भाग रहा होता है, पर भीतर एक अजीब-सी स्थिरता बनी रहती है।
अपना जन्मदिन मनाते-मनवाते, फिर बच्चों के जन्मदिन की तैयारियों में व्यस्त रहते-रहते कब जीवन इस मुकाम तक आ पहुँचा—पता ही नहीं चला। अब कभी-कभी मन में यह ख्याल भी आता है कि अगला पल कहीं आख़िरी तो नहीं। यह विचार डर या नकारात्मकता से नहीं उपजता, बल्कि उस पड़ाव की पहचान है, जहाँ खड़े होकर इंसान जीवन को सतह से नहीं, गहराई से देखने लगता है।
कल एक मित्र से यूँ ही बातचीत हो रही थी। बातों-बातों में हम एक अजीब-सी जगह पहुँच गए—गाड़ी की “स्टेपनी” पर चर्चा होने लगी। वही स्टेपनी, जो हर मुश्किल वक़्त में सबसे पहले याद आती है, पर जैसे ही उसका काम खत्म होता है, उसे फिर से डिग्गी में बंद कर दिया जाता है। मानो उसकी पूरी ज़िंदगी इसी उद्देश्य के लिए बनी हो—ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल हो जाना और फिर भुला दिया जाना।
सोचने पर लगा, हमारे आसपास भी ऐसे कितने ही लोग हैं—दफ्तरों में, समाज में—जो बिल्कुल स्टेपनी जैसे हैं। उनकी अहमियत से कोई इनकार नहीं कर सकता; मुश्किल घड़ी में वही सबसे पहले काम आते हैं। पर उनकी उपयोगिता क्षणिक मान ली जाती है। उन्हें वह पहचान, वह सम्मान शायद ही मिल पाता है, जिसके वे हकदार होते हैं। फिर भी वे बिना किसी शिकायत के, पूरे धैर्य और समर्पण के साथ अपना काम करते रहते हैं।
शायद यही जीवन का एक कठोर सत्य भी है—हर किसी की भूमिका मुख्य मंच पर नहीं होती। कुछ लोग परदे के पीछे रहकर ही पूरी व्यवस्था को संभाले रखते हैं।
जिंदगी नकारात्मकता का नाम नहीं है। आपको सकारात्मक होना होगा उस स्टेपनी की तरह जिसे मालूम है कि उसकी नियति हमेशा ही डिग्गी में बंद रहने की है। कभी-कभी ही उसे बाहर निकाला जाता है , उसे अनदेखा किया जाता है फिर भी उसे किसी से कोई गिला शिकवा नहीं। अपने काम को वो बखुबी अंजाम देते हुए फिर से चुपचाप डिग्गी के अंदर चली जाती है। हम और आप अपनी गाड़ियों में समय समय पर व्हील्स को रोटेट करते हैं, उसमें हवा वगैरह डलवा कर बिल्कुल सही रखते हैं, पर उस वक्त हमें कभी भी उसकी याद नहीं आती है। हमें तो उसकी याद तभी आती है जब हम मुश्किल में होते हैं और वो बिना किसी चूं चा के हमारा साथ निभाती है। हमें मुश्किल हालात से बाहर निकालती है।

मनीष वर्मा “मनु”

Leave a Reply